आदरणीय सुरेश जी का ऊर्जस्वल व्यक्तित्व और सृजनशील कर्तृत्व सहज ही सहृदयों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। मैं स्वयं को भाग्यवान और पुण्यवान मानती हूं कि मुझे इनका आत्मीय सान्निध्य और स्नेह मिला है। बहुत ही सरल परिणामी, सहज और सहृदय व्यक्ति हैं। आपके पिता बहुत ही अनुशासन प्रिय, दबंग और निर्भय प्रकृति के थे एवं माता श्रीमती दुर्गा देवी में आध्यात्मिकता एवं भक्ति भाव कूट-कूट कर भरा था। माता-पिता से प्राप्त संस्कार आपके व्यक्तित्व को निखारने में मुख्य निमित्त बने। राष्ट्रकवि दिनकर कहा करते थे कि जीवन न केवल भावना है और न केवल बुद्धि; आदर्श मनुष्य वह है जिसकी बुद्धि और भावना दोनों में समन्वय होता है। मैंने सुरेश जी में भावना और बुद्धि का अद्भुत संतुलन देखा है। उन्होंने बुद्धि को उतना ही महत्व दिया है जब तक वह भावना पर आघात न करे।
इसे एक सुखद आश्चर्य ही कहा जाएगा कि सुरेश जी साहित्य के नहीं, विज्ञान के विद्यार्थी रहे। बचपन और युवावस्था में लेखन के प्रति विशेष रुझान नहीं था और न ही गंभीरता से लिखने का कभी प्रयास किया। किंतु नियति की योजना ने अकस्मात उनके जीवन की दिशा बदल कर साहित्य सृजन की ओर उन्मुख कर दिया। 2006 में गंभीर रूप से अस्वस्थ होने पर, जीवन के उत्तरार्ध में 2011 से — लगभग 59 वर्ष की उम्र से — साहित्य सृजन प्रारंभ किया और उसके बाद कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2011 से लेकर 2024 तक मात्र 13 वर्षों की अवधि में उन्होंने विपुल मात्रा में साहित्य सृजन किया है जिसे देखकर कोई भी दांतों तले उंगली दबा सकता है। उनमें प्रतिभा की प्रखरता है और अध्ययनशीलता का गांभीर्य है। मैं उनके दिव्य व्यक्तित्व और साहित्य के कुछ बिंदुओं को रेखांकित करना चाहूंगी —
आध्यात्मिक ऊर्जा के अक्षय स्रोत
आपने अपने जीवन में आध्यात्मिकता को सर्वोपरि स्थान दिया है। अध्यात्म उनके प्रत्येक विचार और व्यवहार में प्रतिबिम्बित होता है। इनकी अधिकांश रचनाएं पाठकों के हृदय में आध्यात्मिकता का संचार करती है।
ढाई आखर प्रेम का
जीवन की पहली पाठशाला परिवार होता है। घर परिवार में अनेक लोग रहें और एक दूसरे से प्रेम न करें तो जीवन जड़वत है। जीवन होने के बाद भी वहां मुर्दानगी छाई रहती है। वस्तुतः घर परिवार का मूल प्राण है — प्रेम। इस तथ्य को आपने गहराई से हृदयंगम किया है। आपने अपने परिवार में ऐसा वातावरण बनाया है कि लोग एक दूसरे से प्रेम करें। मैं समझती हूं कि उनके जीवन की सुंदरता और भव्यता का राज है कि उनके घर परिवार के प्रत्येक सदस्य के बीच प्रेम है। प्रेम उनका आंतरिक आधार है। इनकी कविताएं प्रमाण है कि ये परिवार जनों की कद्र करते हैं, उनके गुणों को समझते हैं एवं उनकी प्रशंसा करने में कभी भी कोताही नहीं करते। अपने आदरणीय माता-पिता की जन्म तिथि एवं पुण्यतिथि पर प्रतिवर्ष कविता के माध्यम से उन्हें भावांजलि समर्पित करते हैं। अपनी माता स्वर्गीया दुर्गा देवी चौधरी की स्मृति में तो प्रति माह काव्य पाठ का आयोजन करते हैं जिसमें महानगर के वरिष्ठ कवियों को आमंत्रित कर काव्य पाठ किया जाता है। पूज्य माताश्री को समर्पित एक कविता की बानगी देखिए —
गीता सी पवित्र और पूजनीय हो मां तुम, / नैनकौर के नीर सी अतुलनीय हो मां तुम। / चिर आनंद प्रतीक प्रातः स्मरणीय हो मां तुम / आलोक प्रदायनी आति वंदनीय हो मां तुम॥
एक अन्य कविता में मां के प्रति श्रद्धा इस प्रकार व्यक्त हुई है —
प्रथम गुरु बन ज्ञान दिया बचपन में, / तू प्रेरक सुरभित पुष्प उपवन में। / आशा की एक लौ जली है मन में, / तू है एक नूतन आस्था जीवन में। / तू पूजा तू ही मंदिर / तू ही देव / तू ही देवालय / तू ही ज्ञान सदैव।
बेटी पर केंद्रित ‘पितृ मन’ शीर्षक से रचित कविता मन को भावाभिभूत कर देती है —
सुन री मोरी सोन चिरैया / काहे तूने नेहा लगाया / मोह माया से परे था मैं / काहे तूने मोहे फसाया / तेरे मस्तक को स्नेहिल हाथों से / सहलाऊं मन करता / सहमी सी चिरैया को नई सुबह / दिलाऊं मन करता / शीघ्र उड़ान भर गगन की ऊंचाई / नाप लो मन में आया
इनकी सहधर्मिणी श्रीमती शारदा जी सदैव छाया की तरह इनके साथ रहती है। अपने विवाह की प्रत्येक वर्षगांठ एवं शारदा जी के जन्मदिन पर आपकी काव्य धारा प्रस्फुटित हुई है। विवाह की वर्षगांठ के उत्सव पर ‘कुछ माणिक कुछ मोती’ काव्य पुस्तक तो पत्नी को ही समर्पित की है। हृदय की गहराई से निकली कितनी भावपूर्ण पंक्तियां हैं —
पंथ कंटक था सुमन बिछा कर / कोमल बनाया तुमने / मन विग्रह निग्रह से विचलित था / कुमुद खिलाया तुमने / सुख-दुख में बन आलम्ब क्षण-क्षण / साथ निभाया तुमने / वर्षों पूर्व जो वचन लिए थे निभाना सिखाया तुमने
सुरेश जी के निर्मल स्नेह की यह धारा अपने मित्रों एवं समाज बंधुओं के प्रति भी सहज रूप से प्रवाहित है। मित्रों के सुख में सुखी होते हैं और उनकी पीड़ा उन्हें व्यथित करती है। अपनी असीम ऊर्जा को अपने समाज बंधुओं के संग साथ सावधानीपूर्वक, सजगतापूर्वक खर्च करते हैं। प्रेम, इंसानियत और सामाजिकता की जुगलबंदी ही इनकी व्यापक स्वीकार्यता और खुशहाली का राज है।
निरहंकारिता
आप विविध संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान, पुरस्कार, उपाधियां, अभिनंदन एवं प्रशस्ति प्राप्त कर चुके हैं। मंच पर काव्य पाठ के लिए देशभर से आमंत्रण आते हैं। कोलकाता महानगर ही नहीं, देश-विदेश के साहित्यकारों के बीच आप आदरास्पद हैं। इतना यश प्राप्त करने के बाद भी अहंकार आपको छू तक नहीं गया है। जिस प्रकार फलों से लगा हुआ वृक्ष झुक जाता है, उसी तरह उपलब्धियों ने सुरेश जी को और अधिक विनम्र बनाया है। मेरा विश्वास है कि थोड़े या अधिक समय के लिए जिन लोगों ने उनको देखा या सुन लिया, वे उन्हें कभी भी विस्मृत नहीं कर पाएंगे।
सहनशीलता
सुरेश जी की देह में सभी बीमारियों ने घर जमाया है। कूल्हों का प्रत्यारोपण, हृदय रोग, दांतों एवं आंखों की बीमारी, डायबिटीज, मयासथेनिया आदि अनेक रोगों से इनका शरीर आक्रांत है। विगत 1 वर्ष से कर्क रोग से भी पीड़ित हो गए हैं। एड़ी से चोटी तक दर्द ही दर्द है। भयंकर बीमारियों एवं प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद आपने कभी भी स्वयं को हताश, निराश नहीं होने दिया। जीवन में आने वाली हर विपरीत परिस्थिति को एक चुनौती की तरह स्वीकार किया और अपनी कुशलता से, सर्जनात्मकता से एक उपलब्धि के रूप में परिवर्तित कर दिया। ‘जो होगा सो होगा, जो होना होगा वही होगा’ — ये पंक्तियां उन्होंने अपने मन मस्तिष्क में अंकित कर रखी हैं। दुःख, दैन्य और दुर्बलता से मुक्त रहकर हर परिस्थिति में एक कर्मयोगी की तरह जीवन जीते हैं। वर्तमान समय में जब मनुष्य का धैर्य बिल्कुल चुक गया है, आपकी सहिष्णुता सबके लिए प्रेरक है।
साहित्य में मूल्यबोध
आपने अपने साहित्य के माध्यम से जीवन मूल्यों को स्थापित करने का प्रशस्य उपक्रम किया है। मूल्य संस्कृति, समाज और राष्ट्र का विकास ही नहीं करते, उन्हें सार्थकता भी प्रदान करते हैं। सुरेश जी का मूल्य बोध अत्यंत व्यापक, गहन और तलस्पर्शी है। वे मानते हैं कि मूल्य यदि जीवन के साथ नहीं जुड़ते अथवा मानवीय उत्कर्ष के साथ स्वयं को नहीं जोड़ते तो वे मूल्य नहीं हो सकते। भारतीय सांस्कृतिक मूल्य, नैतिक आदर्श एवं मानव मन के भावों की बहुत ही सहज अभिव्यक्ति आपके साहित्य में हुई है। आपका मत है कि मूल्यों का ह्रास उतना चिंताजनक नहीं जितना कि मूल्यों के प्रति विश्वास का उठना समस्या पैदा करने वाला है। ह्रास को विकास में बदला जा सकता है, पर विश्वास उठने का मतलब है अपने अस्तित्व को नकारना। अपने साहित्य के माध्यम से सुरेश जी ने उन्हीं मूल्यों को छुआ है जो देश, काल, समाज और परिवार सापेक्ष है। उनकी एकमात्र अभीप्सा है कि मानव मन की अशान्ति दूर हो और वहां प्रेम, दया, करुणा, समता, परोपकार आदि मानवीय गुणों का विकास हो। साहित्य के माध्यम से नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा करके वे समाज का सांस्कृतिक जागरण करना चाहते हैं। राम, कृष्ण, शिव एवं अन्य पौराणिक चरित्रों के माध्यम से मूल्यों एवं मानवीय गुणों को उभारा है। वे धर्म को शाश्वत मूल्य के रूप में स्वीकार करते हैं। वे सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, सरलता, अभय, अनुशासन, मर्यादा, विनम्रता और परमार्थ वृत्ति को महत्वपूर्ण मानवीय मूल्य मानते हैं, जिनके बिना व्यक्ति अपने अस्तित्व को सुरक्षित नहीं रख पाएगा। कवि की निश्चित मान्यता है कि दूसरों को दुःख पहुंचाने वाला व्यक्ति कभी स्वयं प्रसन्नता और आनंद का जीवन जी नहीं सकता। सामाजिक मूल्यों के संदर्भ में निम्न पंक्तियां कितनी प्रेरक हैं —
जो दुःख हर दूसरों का जीता, / वही मनुज आते हैं याद मृत्युपरांत / आत्मा उनकी इस लोक भी — उस लोक भी, / कर परमार्थ हो कांत / सुधा पान कर अमरत्व नहीं होता प्राप्त, / कर दीन की सेवा महान / प्रसन्नता मिलती पहचान कर, / स्वयं का विश्व के प्रति योगदान। / सुखमय जीवन करती उसकी उदारता, / जिसने भी बांटा निष्काम / आशीर्वाद ले दीन दुखियों का, / संसार का यह सबसे बड़ा सत्काम।
कहा जा सकता है कि उनके साहित्य में मानवीय मूल्य सर्वत्र स्पंदित हुए हैं।
विसंगतियों पर प्रहार
अपने सिद्धांतों और आदर्शों के साथ समझौता सुरेश जी को कभी भी स्वीकार नहीं हुआ। अपनी रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों एवं विडम्बनाओं पर खुलकर प्रहार किया है। स्थान-स्थान पर इन्होंने भोगासक्त जनता को प्रतिबोध दिया है कि विषय वासना में मग्न मानव कभी आनंद और आंतरिक प्रकाश की अनुभूति नहीं कर सकता। काम भोग मनुष्य की चेतना को विकृत करके अतृप्ति की आग को भड़काने वाले हैं। अतृप्ति और अधर्म के गलियारे से होकर आता अर्थ इन्हें कदापि स्वीकार नहीं। द्यूत, हिंसा, मद्य और व्यभिचार के विरुद्ध कवि का आक्रोश इस प्रकार फूट पड़ता है —
अहितकर अर्थ कामना / लोलुपता है यह भ्रष्टाचार, / परिमार्जन कर स्वयं को / हटाना है यह अत्याचार। / शास्त्रों में बताया है कलि के / अवतरण के प्रकार
अधर्म का अर्थ द्यूत, हिंसा, मद्य और व्यभिचार — कवि का स्पष्ट मत है कि वही कार्य करना चाहिए जो इहलोक और परलोक में सुखदाई हो।
अगाध राष्ट्रभक्ति
आपका हृदय राष्ट्र भक्ति और भारतीयता की भावना से आप्लावित है। इस देश के सभी संतो, मनीषियों, वीर, वीरांगनाओं और महापुरुषों के प्रति आप अत्यंत श्रद्धा भाव रखते हैं। महाराणा प्रताप, राणा सांगा, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेई, चंद्रशेखर आजाद आदि महापुरुषों के चरणों में अपनी काव्यमय विनयांजलि समर्पित की है। भारतरत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई को समर्पित पंक्तियां मननीय हैं —
अटल अटल है, / अटल उनका अटल आत्मविश्वास / भारत का सच्चा रत्न है गर्वित हो गया इतिहास / राजनीति के मंच पर सदा रहे दुश्मन भी मित्र / एकमात्र निर्विवाद व्यक्तित्व उत्कर्ष रहा चरित्र
‘स्वाभिमान’ शीर्षक कविता में राणा सांगा के प्रति कवि ने भाव भरा अर्घ्य समर्पित किया है —
अस्सी घाव लगे थे तन में, / नव उमंग थी फिर भी मन में / अपनी अस्मिता बचाने को / मर मिटने की ठानी रण में
देश भक्ति के भावों से ओतप्रोत ऐसी असंख्य कविताएं हैं जो भारत, भारतीयता, भारतीय संस्कृति, धर्म, अध्यात्म तथा भारतीय भाषाओं के प्रति कवि के गहन लगाव को दिग्दर्शित करती हैं।
भाषा सौष्ठव
कवि का शब्द भंडार जितना समृद्ध होगा उतनी ही उसकी भाषा शैली समृद्ध मानी जाएगी। सुरेश जी का शब्द भंडार इतना समृद्ध है कि गूढ से गूढ भावों को सरलता से प्रकट करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती। उनकी भाषा जीवन के साथ जुड़ी हुई है, अतः सीधा हृदय को स्पर्श करती है। प्रथम दृष्टि में कहीं-कहीं उनकी भाषा क्लिष्ट, दार्शनिक, समासबहुल लगती है, लेकिन गहराई से देखने पर स्पष्ट हो जाएगा कि आप भावानुकूल शब्द प्रयोग के कुशल चितेरे हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी की यह उक्ति — ‘शक्तिशाली कवि शब्दों की नाड़ी पहचानते हैं’ — सुरेश जी के शब्द चयन कौशल पर चरितार्थ होती है। कविता में शब्द चयन की पटुता से ही ध्वन्यात्मकता और नाद सौंदर्य उत्पन्न होता है। कह सकती हूं कि आप शब्दों के जादूगर हैं। आपकी शब्द योजना बहुत उपयुक्त, नैसर्गिक और विषयानुरूप होती है।
काव्यानुवाद
अनुवाद सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमुख कारक तत्व है। किसी भी कृति का अनुवाद किसी ग्रंथ लेखन से कम परिश्रम का कार्य नहीं। गद्य की अपेक्षा पद्यानुवाद अधिक कठिन है क्योंकि इसमें शब्दों का सम्यक चयन करना होता है। आदरणीय सुरेश जी ने अनेक संस्कृत पद्यों एवं स्तोत्रों का काव्य में भावानुवाद किया है। अनुवाद में कहीं-कहीं प्रसंगानुसार परिवर्तन और परिमार्जन भी किया है। उनका अनुवाद सटीक और मूल भावों को अक्षुण्ण रखने वाला होता है।
प्रकृति प्रेम
मानव जीवन के साथ प्रकृति का आत्मीय संबंध है। सुरेश जी का प्रकृति के प्रति प्रेम अत्यंत परिष्कृत है। विविध स्थानों का पर्यटन करने के कारण प्रकृति के सहज रमणीय सौंदर्य को देखने का अवसर इन्हें मिला। प्रकृति अपनी सजीवता, ताजगी और सौंदर्य से उन्हें आकृष्ट करती है। सभी ऋतुओं के सजीव चित्र कवि ने उकेरे हैं। वर्षा ऋतु का एक मनोरम चित्र देखिए —
पावस की यह प्रथम जल धार अरे / हिय स्पंदित भिगो भिगो तार करे / चंचल विभावरी सकल मेघ गर्जन / झंकृत बदन और मन मल्हार करे
ग्रीष्म ऋतु की प्रचंडता की निम्न अभिव्यक्ति बहुत ही सुंदर बन पड़ी है —
प्रचंड तेजोमय तरुण भास्कर कर / रहा ऊष्मित अवनि तन को / अर्ध निशा का शीतल विधु / उद्वेलित कर रहा शांत मन को / तृषित नयन तृषित प्रिया के दग्ध विरह में / ढूंढ रहे सजन को / मन्मथ वेग भी हुआ शांत है / तप्त निदाघ में प्रिय मिलन को
प्रकृति को समानुभूति के रूप में प्रस्तुत करने के कारण उनकी प्रकृति भी मानव के सुख में सुखी तथा दुख में दुखी होती है।
सारांशतः कह सकती हूं कि अपने उच्च विचारों और अद्भुत सृजन कौशल से सुरेश जी ने अपने व्यक्तित्व को शिखर की ऊंचाई तक पहुंचा दिया है। उनका व्यवहारिक जीवन सद्गृहस्थों के लिए प्रेरक है। उनका जीवन एवं साहित्य जनजीवन को प्रतिबोध देकर नई रोशनी विकीर्ण करेगा, ऐसा विश्वास है। मैं कामना करती हूं कि वे स्वस्थ रहें, शतायु हों और अपनी सृजनात्मकता से मां भारती को समृद्ध करते रहें।