प्रशंसा पत्र

प्रशंसा पत्र

जिन्होंने उन्हें निकट से जाना — उनके शब्दों में।

अभिव्यक्तियाँ

उनके अपनों की क़लम से

सोमा बंदोपाध्याय
विश्लेषण

प्रस्तुत अनुवाद में मूल भावना को सम्पूर्ण रूप से आत्मसात कर सुरेश चौधरी जी ने हिन्दी में जो अभिव्यक्ति दी है वह गंभीर चिंतन और अथक प्रयास का सराहनीय उदाहरण है।

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आमि ढालिबो करुणा धारा / आमि माँगिबो पाषाण कारा / आमि जगत प्लाबिया बेड़ाबो गांहिया / आकुल पागोल पारा॥

‘करुणा धारा’ से प्लावित वह विशाल साहित्य जिसके सृजनकर्ता थे रवींद्रनाथ, रवींद्र साहित्य के नाम से विख्यात है और आज भी मनुष्य की हर विषम परिस्थिति में उसे सटीक पंथ की दिशा देता है, निरंतर कठिनाइयों से जूझते रहने की प्रेरणा देता है, मनुष्यत्व के लक्ष्य की ओर अग्रसर होने की इच्छा को बलवती बनाता है। रवींद्र-सागर में जो एक बार अवगाहन करता है, वह बहता ही जाता है, डूबता ही जाता है, पर किनारा नहीं मिलता — इतना विराट विशाल जलधि है वह।

विश्व कवि की कविताएँ अपनी मार्मिकता, भावप्रवणता और विषय-वैविध्य के कारण केवल बंगला भाषी समाज में ही नहीं वरन् समस्त भारतीय भाषाओं के काव्य-प्रेमियों में समान रूप से समादृत हैं। बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि कलागुरु रवींद्रनाथ ठाकुर के गीत न केवल बांग्ला एवं भारतीय साहित्य की, अपितु विश्व साहित्य की अमूल्य निधि हैं, और इसका अनुवाद लगभग हर भारतीय एवं कई विदेशी भाषाओं में उपलब्ध है।

अनुवाद अत्यंत दुरूह और कठिन कार्य है। काव्यानुवाद तो और भी दुस्साध्य है, क्योंकि काव्य का छंदबद्ध अनुवाद एक दुस्तर कार्य माना जाता है। परंतु श्री सुरेश चौधरी ‘इन्दु’ जी ने रवींद्र-काव्य को आत्मसात करके उनका जो गीतान्तरण किया है वह अत्यंत रसपूर्ण एवं कर्णप्रिय है — साथ ही विश्वसनीय भी।

श्री सुरेश चौधरी जी से मेरा परिचय हुए लगभग एक दशक हो गया है। सरल-सौम्य, ज्ञानी और शिष्टाचारयुक्त उनके कवि-व्यक्तित्व में एक आत्मीय आकर्षण है, जिसका कारण है कि अनूदित कविताओं को पढ़ते समय मूल कविता को पढ़ने का आनंद मिलता है। प्रस्तुत अनुवाद में मूल भावना को सम्पूर्ण रूप से आत्मसात कर उन्होंने हिन्दी में जो अभिव्यक्ति दी है वह गंभीर चिंतन और अथक प्रयास का सराहनीय उदाहरण है। इस स्तुत्य प्रयास के लिए सुरेश जी को हार्दिक बधाई एवं साधुवाद देती हूँ।

रवींद्र की कविताएँ क्षुद्रता से विराटता की ओर, स्वार्थ से परमार्थ की ओर एवं वासना से वैराग्य की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती हैं, जो हमें सदैव आकर्षित करती आई हैं; और उसमें ही सुरेश जी ने अपने जीवन की दिशा को खोज निकाला है। यही कारण है कि केवल अपना आनंद या ख्याति प्राप्त करने के लिए ही नहीं, वरन् समग्र हिंदी जगत को विश्वकवि के सुर में उनकी वाणी सुनाने के भाव से ऐसी साधना उन्होंने की है।

मैं श्री सुरेश चौधरी जी की अनुपम कृति ‘अड़सठ शरद’ का स्वागत करती हूँ एवं मुझे विश्वास है कि उनकी निष्ठा रवींद्र के अन्य काव्यग्रंथों का भी भाषांतरण प्रस्तुत कर काव्य एवं संगीत प्रेमियों का समादर प्राप्त करेगी।

अशेष शुभकामनाओं सहित।

सोमा बंदोपाध्याय
कुलपति — बाबा साहब अंबेडकर विश्वविद्यालय
कोलकाता, पश्चिम बंगाल
विश्लेषण

सुरेश जी के परिचय का एक वाक्यीय निचोड़ यही है कि असामान्य व्यक्तित्व के सामान्य व्यक्ति से मिलना हो तो चलो सुरेश जी से मिल आते हैं। एक कवि के नाते ११४५ दिनों में १००० भजनों की रचना करने का वैश्विक कीर्तिमान सुरेश जी ने स्थापित किया है।

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विज्ञान के छात्र का वित्तीय क्षेत्र में प्रवेश कर सफलता अर्जित करना, मध्य वित्तीय परिवार के किसी युवक का युवावस्था में ही उद्योगपति हो जाना, आर्थिक लेखा-जोखा में पारंगत व्यक्ति का काव्य-लेखन तथा भाषाई भावानुवादक बन कर साहित्यकार बन जाना और किसी रोगग्रस्त व्यक्ति का घर की चार दीवारी में सिमटने की बजाय सामाजिक सरोकार से जुड़े रहना — ऐसे विरोधाभासी व्यक्तित्व के धनी होने वाले मेरे परिचितों में पहला नाम है श्रीमान सुरेश चौधरी ‘इन्दु’।

सुरेश जी से मेरा परिचय लगभग ६-७ वर्ष पूर्व कोलकाता निवासी उम्मेदसिंह तथा स्नेहलता बैद दम्पति के माध्यम से हुआ था। वर्ष में २-३ बार कोलकाता आवागमन के क्रम में सुरेश जी से भी मिलना होता रहा, परंतु इसी बीच कोरोना से बचाव की बाध्यता ने इसे भी बाधित किया। सहज और अनौपचारिक रूप से मिलने और वार्तालाप करने का जो भी अवसर मिला, उससे प्राप्त इनके परिचय का एक वाक्यीय निचोड़ यही है कि असामान्य व्यक्तित्व के सामान्य व्यक्ति से मिलना हो तो चलें सुरेश जी से मिल आते हैं। एक कवि के नाते ११४५ दिनों में १००० भजनों की रचना करने का वैश्विक कीर्तिमान सुरेश जी ने स्थापित किया है। सन् २०११ से पूर्व तक लक्ष्मी की साधना में लगे रहने वाले ने केवल १२-१३ वर्षों की सरस्वती-साधना के परिणामस्वरूप १२-१३ प्रकार के सम्मान अर्जित कर लिये हैं। आरती, भजन आदि भक्ति भावी रचनाओं के साथ ही सामाजिक सरोकार से जुड़े हुए लेखों के संकलन के रूप में ‘भ्रम, भ्रमित एवं भ्रांतियां’ इस पुस्तक का प्रकाशन इनके बहु आयामी चिंतन का उदाहरण बन गया है।

भजन, आरती आदि भक्ति भावी रचनाओं के साथ ही युवा तथा शिशु मन को लुभाने वाले विविध विषयों पर कविता, लेख आदि की रचनाओं ने यह प्रमाणित कर दिया है कि सुरेश जी का साहित्य बहुआयामी है। हिन्दी के साथ ही संस्कृत भाषा में भी श्लोकों की रचनाओं में अर्जित दक्षता के कारण उनको सामान्य व्यक्ति के असामान्य व्यक्तित्व और कृतित्व का प्रमाण पत्र दिया जाना स्वाभाविक है।

अपनी जीवन यात्रा के अडसठवें पडाव के अवसर पर, अर्थात सरस्वती-साधना के मात्र १० वर्ष की अवस्था में, कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर के चुनिंदा अडसठ गीतों का बांग्ला से हिन्दी में भाषान्तर कर केवल भावानुवाद ही नहीं, छन्दानुवाद करने का साहस जुटाना सामान्य बात नहीं है। यह चुनौती भरा काम साहित्य जगत का सराहनीय तथा प्रेरणादायी काम सिद्ध होगा।

संगीत की एक विशेष विधा स्वयं रवींद्रनाथ ने प्रचलित की थी, जो रवींद्र संगीत के नाम से जानी जाती है। अलग-अलग घरानों के शास्त्रीय संगीत के समान ही रवींद्र-संगीत भी एक घराना ही है। संगीत की परिपूर्णता जिन तीन विधाओं के मिलन से होती है, उन तीनों विधाओं का अर्थात गायन, वादन और नृत्य का स्वयं रवींद्रनाथ ने भरपूर उपयोग किया है।

रवींद्रनाथ इन तीनों विधाओं के जानकार थे, उनमें पारंगत थे और नव-सृजनकर्ता भी थे। ऐसे व्यक्ति के साहित्य-सृजन का छन्दबद्ध अनुवाद हर किसी के बस का नहीं है। श्रीमान सुरेश चौधरी ‘इंदु’ जी के अनुवाद में भी कुछ स्थानों पर ऐसा प्रतीत होता है कि छन्द मिलाने की प्रधानता के कारण कुछ शब्दों का भाव अनुवादक को बदलना पड़ा है, परन्तु इस साहस के सामने इसे अपराध नहीं, अपवाद के रूप में क्षम्य मानकर स्वीकार किया जाना चाहिए।

शब्दों के खिलाड़ियों के द्वारा भावों के साथ होने वाली खिलवाड़ भी पाठकों के लिये अर्थों की बहुलता दे जाती है। ‘इंदु’ जी के साहित्य की बहुलता में अर्थों की बहुलता को खोजने का आनंद भी पाठकों को प्राप्त होता है। यह आनन्द भविष्य में भी प्राप्त होता रहे, इसी कामना के साथ अपनी कलम को विराम देता हूँ। धन्यवाद।

लक्ष्मीनारायण भाला ‘लक्खीदा’
लक्ष्मीनारायण भाला ‘लक्खीदा’
वरिष्ठ चिंतक एवं लेखक
नई दिल्ली, भारत
अभिमत

संस्कृत वह श्रीयंत्र है, जिसका मूल्य जितना हम समझेंगे, उतना हम स्वयं मूल्यवान बनेंगे। निश्चय ही, चौधरी जी धन्यवाद के पात्र हैं कि उन्होंने पूरी सतर्कता से यह रचना की है।

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सुरेश चौधरी जी जबतक कलकत्ता आये, तबतक मैं वहाँ से बोरिया बिस्तर बाँधकर हिमालय की गोद में चला आया था। अपने कलकत्ता प्रवास में मैं वहाँ के मारवाड़ी समाज से बहुत घुल-मिल गया। उनका रहन-सहन, साहित्य-संगीत-कला के प्रति अटूट प्रेम और रघुकुल रीति जैसी वचनबद्धता मेरे लिए चमत्कृत करनेवाली थी। ये सारी बातें अगर किसी एक व्यक्ति में सिमटी हुई मिलें तो आप उन्हें सुरेश चौधरी कह सकते हैं। कितना कुछ करते रहते हैं वे! वयस्कता की प्रवृत्तियों को धता बताते हुए वे दिनरात कविता लिखते हैं, दूसरों से लिखवाते हैं, उनका प्रचार-प्रसार करने के लिए इंटरनेट की अद्यतन सुविधाओं का उपयोग करते हुए आनलाइन गोष्ठियां आयोजित करते हैं।

चौधरी जी इतने पर ही नहीं रुके। भारत की सबसे बड़ी समस्या इसका मूल से कट जाना है। जैसे जड़ से कटा हुआ वृक्ष जीवन-रस न पाकर मुरझाकर सूख जाता है, वैसे ही संस्कृत से कटा हुआ भारतीय समाज बौद्धिक संपदा की दृष्टि से दरिद्र हो गया है। संस्कृत मात्र भाषा नहीं, विद्या है। इस विद्या को पढ़कर विदेशी लोगों ने गत दो सदियों में आविष्कारों की झड़ी लगा दी और हम अपने इतिहास को भी मिथ मानकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते रहे।

भला हो आजादी के अमृत महोत्सव का, जिसने जागरूक भारतीयों में अपने मूल को सींचने और उसकी देखरेख करने की चेतना जगायी। उसी चेतना की लहर से उपजी यह पुस्तक ‘चमत्कृत करती भाषा-संस्कृत’ वस्तुतः समय की मांग है। यह संस्कृत के प्रति जिज्ञासुओं की ज्ञान-पिपासा को शांत करने के लिए अमृत कलश की भाँति है। मैं स्वयं चमत्कृत हूँ इसे पढ़कर। इसमें क्या नहीं है? संस्कृत भाषा की दुर्लभ विशेषताओं से तो परिचय कराया ही गया है, ज्ञान-विज्ञान की भाषा संस्कृत के महान गौरव ग्रंथों पर भी प्रकाश डाला गया है। यहाँ तक कि वेदों में वर्णित वैज्ञानिक सिद्धांतों को भी रेखांकित किया गया है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में हमारे पूर्वजों का ज्ञान इतना अग्रगामी है कि वहाँ तक पहुंचने में आधुनिक विज्ञान को सहस्राब्दियाँ लग जाएँगी। इसी प्रकार हमारी काल-गणना, गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत, ध्वनि विज्ञान, देवनागरी लिपि आदि ऐसी निधि हैं, जिनका उपयोग कर हम विश्व को नेतृत्व दे सकते हैं। वह सिलसिला शुरू भी हो गया है। कई देशों के शीर्ष यानी राष्ट्राध्यक्ष पद पर भारतवंशियों का आसीन होना आनेवाली सहस्राब्दी का श्रीगणेश है, जिसमें विश्व पर भारतीय प्रज्ञा राज करेगी। आवश्यकता है अपने गुणों को पहचानने की। संस्कृत वह श्रीयंत्र है, जिसके मूल्य को जितना हम समझेंगे, उतना हम स्वयं मूल्यवान बनेंगे।

निश्चय ही, चौधरीजी धन्यवाद के पात्र हैं कि उन्होंने पूरी सतर्कता से इस पुस्तक की रचना की है। मुझे पूरा विश्वास है कि जिज्ञासु पाठक वर्ग इसे हाथों हाथ लेगा।

डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
सुप्रसिद्ध गीतकार एवं साहित्यकार
देहरादून
शब्द-चित्र

आप समाज की विविध समस्याओं के निदान एवं उसके उत्कर्ष के प्रति सदैव सजग रहते जान पड़ते हैं। आपके द्वारा पृथक-पृथक विषयों पर लिखित आलेख वास्तव में सराहनीय हैं।

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मैं समझती हूँ कि सुरेश जी पर कुछ लिखने से पहले मैं उनके बारे में पाठकों को जरूर कुछ बता दूं। आपने विज्ञान में स्नातक, चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट्स, एकोल सुपेरियारेरोबोर्ट दी सौबोर्न फ़्रांस द्वारा पीएचडी (अर्थ एवं वित्त विश्लेषण) में स्वीकृत मानद (बीएससी, एफसीए, पीएचडी) की हुई है। आपके साहित्यक जीवन में आपकी अनेक उपलब्धियां आपके साथ कदम से कदम मिला कर चलती रही हैं। आपके लिए पहले तो मैं यह कहूँ कि वास्तव में आप एक सहृदय और स्नेहिल व्यक्तित्व के धारक हैं। आप अपने जीवन में एक सफल अर्थशास्त्री रहे हैं, साथ ही आप एक उच्चकोटि के साहित्यकार भी हैं। आप के द्वारा रचित भजनमाला एवं अन्य ईश्वर के प्रति समर्पित अनेकों उच्चकोटि की रचनाएं आपको साहित्य के क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करने वाली हैं।

आपकी लिखित कुछ अद्भुत पंक्तियों को मैं उद्धृत करना चाहती हूँ जो आपके अंतस में व्याप्त कोमल संवेदनाओं को परिभाषित करती हैं —

हे चन्द्रशेखर अब तो बाहर आओ कैलाश से, / कालकूट निकल रहा अब भारत प्रभास से, / हलाहल ऊष्मा को तजने शीतलता पाने को / फिर से शशि धारण करना होगा ललाट पे

आप शब्द को परिभाषित करते हुए कहते हैं —

शब्द प्रेम, शब्द अनुराग शब्द नेह बिखेरते हैं / शब्द विगत कटु स्मृतियां भी, कभी कभी उकेरते हैं / शब्दों के जग में खो गया, तो लुप्त ही साधना / शब्द गूँज इतनी थी, कर गई अशांत मन भावना

आपका प्रकृति के प्रति आकर्षण भी दर्शनीय है —

अर्ध निशा का सघन गगन द्युतमान था विधु प्रभा से / पलक पावनी तारिका माला विभावरी भी थी सजी हुई / उद्वेलित लहरें जलधि मध्य, चांदनी-सी थी रची हुई / चमकती बालुका रत्नाकर तट हेम-कणों सी बिछी हुई।

आप समाज की विविध समस्याओं के निदान एवं उसके उत्कर्ष के प्रति सदैव सजग रहते जान पड़ते हैं। आपके द्वारा प्रथक-प्रथक विषयों पर लिखित आलेख वास्तव में सराहनीय हैं।

साहित्य के क्षेत्र में आपको अनेक सम्मानों से अलंकृत किया गया है। आपकी उपलब्धियों को जान कर तो ऐसा लगता है कि आपको सम्मानित कर सम्मान खुद ही स्वयं को सम्मानित महसूस करता होगा। आप लिखते हैं —

मानस की चौपाई हैं या, अतीत लिखी कथाएं हैं / तुलसी आँन बिरवा है माँ, या वेद की ऋचाएं हैं

आज के परिवेश में जब परस्पर संबन्धों के मूल्य क्षय होते जा रहे हैं तब आप कहते हैं —

उमड़-घुमड़ कर काले बादल, देख निराशा के आएंगे / दुख तो होगा ही जब अपने, स्वयं पराए हो जाएंगे

आपकी आध्यात्मिक सोच —

माटी तन माटी में मिलता, क्यूँ तू यूँ गुमान करे / एक बोल ही तेरे होंगे, क्यूँ न यह बात ध्यान धरे

आपने अपनी साहित्यक यात्रा में लगभग पचास वर्षों के बसंत पार किए हैं और यह यात्रा आपको स्वयं ही साहित्य की वासंतिक बेला तक लेकर आ पहुँची है। आप सदैव साहित्य की सेवा में निरंतर अपना योगदान बनाए रखिए, यही कामना करती हूँ — क्योंकि आप एक महान विचारक और चिंतनशील व्यक्ति हैं। ऐसे में आप जो भी लिखते हैं वह स्वतः ही वन्दनीय हो जाता है एवं हमारे समाज के लिए प्रेरणादायक भी।

यदि मैं अपनी बात करूँ तो मैं आपको जब से जानी हूँ तभी से मेरा आदर सदैव आपके प्रति रहा है, क्योंकि मैं भी थोड़ा बहुत लिखती रहती हूँ। ऐसे में मेरी रचनाओं के प्रति आपके द्वारा प्राप्त उत्साहवर्धन मुझे सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। आपने साहित्य के क्षेत्र में मुझे कुछ ऐसे रास्ते दिखाए हैं जिन पर चल कर मैं भी थोड़ा-बहुत आगे बढ़ सकी हूँ। आपके लिए कुछ पंक्तियाँ —

सुभग मंगलकामना हैं आज शुभ दिन अनुकरण का। / प्रेरणा के स्रोत, जीवन है सरस पथ अनुसरण का। / हैं सुरेश स्वभाव के नम भाई अभिभावक गुरु भी। / आपका व्यक्तित्व शोभित, धर्म थामें आचरण का॥

स्वस्थ तन मन हो सदा खुशहाल जीवन बावली हो। / छंद में स्वर ताल की लय गीत की पुष्पांजली हो। / ज्ञानगंगा में रमें मन शारदे माँ का तनय तू। / मान श्रद्धा स्नेह में ज्यों घुल गई मिश्री डली हो॥

सुधा अहलुवालिया
सुधा अहलुवालिया
कवयित्री
बेंगलुरु, कर्नाटक
अभिमत

वरिष्ठ साहित्यकार, विचारक, चिंतक एवं अर्थशास्त्री आ. सुरेश चौधरी जी की व्यक्तित्व की विशेषता के बारे में जितना कहूँ कम होगा। उनकी उत्कृष्ट लेखनी अनुपम सृजन शब्दों की सीमा से परे है।

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वरिष्ठ साहित्यकार, विचारक, चिंतक एवं अर्थशास्त्री आ. सुरेश चौधरी जी की व्यक्तित्व की विशेषता के बारे में जितना कहूं कम होगा। बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, लेखक आदि आ. सुरेश चौधरी जी के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है।

मैं जब पहली बार उनसे मिली तभी मैं उनके अद्भुत ज्ञान को जानकर उनके समक्ष नतमस्तक हो गई थी। बाद में उनकी रचनाएं पढ़ी, प्रतिदिन पढ़ती रही हूं। प्रतिदिन उनके भजन लिखने की विशेषता ने उनको सामान्य से विशेष बना दिया। उनकी उत्कृष्ट लेखनी अनुपम सृजन शब्दों की सीमा से परे है। उनका व्यक्तित्व शांत सुलझा एक अद्भुत गरिमामयी छवि से परिपूर्ण आकर्षित करता है। साहित्य के ओज की झलक मन में श्रद्धा के दीप प्रज्ज्वलित करती है।

जीवन के संघर्षों को झेलते हुए साहित्य के क्षेत्र में सफलता के इस मुकाम तक पहुंचना बहुत बड़ी उपलब्धि है। सहृदयता और कवित्व का वृहत समन्वय, धर्म संस्कृति से जुड़े लोक कल्याण में संलग्न आत्मविश्वास की मजबूत डोर से बंधे सतत गतिमान कदम, दृढ़ संकल्प की माला गूंथ अपने लक्ष्य को हासिल करने में समर्थ — नमन है आपको।

अंतर मन की उथल पुथल, / कुछ ढूंढते, बिखरते अहसास….. / हथेली की लकीरों में झांकते / अपने भविष्य का निज से निर्माण / अपना पुरुषार्थ सशक्त / बूंद से सागर की ओर, / और इस दौड़ की परिणति….. / सुख दुख से परे अलग पहचान, / साक्ष्य भाव राहें तलाशनी नहीं पड़ी

समक्ष खड़ी थी ठहरना नहीं / बढ़ते चले जाना है / कांटों में भी फूलों का अहसास / मुश्किल पथ अनवरत दौड़…. / मानवीय संबंध अनुराग विराग, / आत्मानुभूति और प्रभु प्रेम आस्था / और विश्वास लौकिक से पारलौकिक / योग का समाविष्ट,

और इससे जुड़ी भावना के सागर में / अनुभव रुपी लहरें की / उथल पुथल पर अनमोल मोती / ढूंढ लाने में समर्थ / आपका अद्भुत व्यक्तित्व—

चंदा प्रह्लादका
चंदा प्रह्लादका
वरिष्ठ साहित्यकार एवं विचारक
विश्लेषण

आपने 1016 दिनों में एक हजार भजन लिखकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है, जो इंटरनेशनल बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में दर्ज हो चुका है। कई पुस्तकें अभी प्रकाशनाधीन हैं।

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मैं जगति का प्रतिकार हूँ / इस पार हूँ उस पार हूँ। / भरी भावनाएं मुझमे, / मैं ही पूर्ण संसार हूँ

ऐसी भावपूर्ण पंक्तियों के रचयिता श्री सुरेश चौधरी ‘इंदु’ हिंदी साहित्य के गौरव है। जमशेदपुर में 1952 में जन्म हुआ। साइंस में स्नातक की शिक्षा ग्रहण कर, चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई की, एक सफल व्यवसायी बने, लेकिन कुछ था जो अभी शेष था। वह थी साहित्यिकी यात्रा।

2011 में जब लेखन और अध्ययन को जीवन में अपनाया तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। रविंद्र नाथ टैगोर की धरा बंगाल में एक जाना-माना नाम। आपकी रचनाएं पढ़कर इन्हें ‘शब्दों का जादूगर’ कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लेखन कार्यों की यदि सूची बनाना शुरू करें तो समाप्त ही नहीं होगी।

हर विधा — हाइकु, छंदबद्ध, छंदमुक्त, चघनद, बाल कविता, आलेख, शोध, वैदिक सनातन — सभी पर खुलकर कलम चलाई है। दूरदर्शन और ताजा टीवी पर चर्चाओं में भागीदारी रही है। अनेक पत्र पत्रिकाओं में नियमित रचनाएं और लेख प्रकाशित होते रहे हैं। अनेक अनुवादित लेखन किए हैं, जिनकी सूची बहुत लंबी है — श्री दुर्गतिविनाशिनी, प्रांजलि, वेद से वेदांत तक, आदिशंकर रस माधुरी जिसमें आदिशंकराचार्य के कई मूल स्रोतों का छंदबद्ध अनुवाद किया है। हर हर महादेव जिसमें स्वरचित संस्कृत में शिव स्तुति भी शामिल है। सुभाषितम, गोपी गीत, सुरतरंगिणी — सबमें अपने लेखन और अध्ययन की अविरल धारा बहायी है। भारतीय काव्य संहिता जिसमें सभी काव्य विधाओं को लिखने का विवरण है, जो नए रचनाकारों के लिए एक आशादीप के समान है।

देश विदेश में ख्याति प्राप्त मंच ‘रचनाकार मंच’ के संस्थापक, जिसमें नियमित काव्य गोष्ठियाँ और चर्चाएँ होती रही हैं। नई रचनाकारों को सदैव प्रोत्साहन करना, उनकी रचनाओं को और परिमार्जित करके साहित्य की अप्रतिम सेवा कर रहे हैं। अनेक साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित आप साहित्य जगत के चमकते सितारे हैं।

आपने 1016 दिनों में एक हजार भजन लिखकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है, जो इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हो चुका है। कई पुस्तकें अभी प्रकाशनाधीन है। आपकी लेखनी ने दिया साहित्यजग को अमूल्य योगदान।

माँ शारदे की असीम कृपा, यह कार्य चल रहा बिना व्यवधान।

कविता की पंक्तियां…

भारत के वीर सैन्य दल का, / शौर्य दिखाने आया हूँ। / तिमिर दूर करने ज्योति-कलश, / आज सजाने लाया हूँ।

भारत देश के वीर बांकुरो को समर्पित इन पंक्तियों में साहस का ओज झलक रहा है।

माटी तन माटी में मिलता, / क्यूँ तू यूँ गूमान करे। / एक बोल ही तेरे होंगे, / क्यूँ न यह बात ध्यान धरे।

जीवन के अंतिम सत्य और मीठी वाणी का मोल बताती रचना।

शब्द प्रेम शब्द अनुराग शब्द नेह बिखेरते हैं। / शब्द विगत कटु स्मृतियां भी, कभी कभी उकेरते हैं।

अपने शब्दों के जादू से शब्दों के राज बताती रचना।

आपकी रचनाओं और व्यक्तित्व पर कुछ लिखना सूरज को दीया दिखाने के समान है। फिर भी आपको समर्पित पंक्तियां —

मुख पर मुस्कान, स्वभाव मिलनसार है। / लेखनी में आपके तीक्ष्ण अति धार है। / ऐतिहासिक घटनाओं पर दिए विचार हैं। / समाज की विसंगति पर करती प्रहार है। / भाव भक्ति से रचा रचनाओं का संसार है। / सभी कृतियां साहित्य को अमूल्य उपहार है।

शशि लाहोटी
शशि लाहोटी
कवयित्री एवं लेखिका
व्यक्तित्व

अद्भुत सृजन कौशल से सुरेश जी ने अपने व्यक्तित्व को शिखर की ऊँचाई तक पहुँचा दिया है। उनका व्यावहारिक जीवन सद्गृहस्थों के लिए प्रेरक है। उनका जीवन एवं साहित्य जनजीवन को प्रतिबोध देकर नई रोशनी विकीर्ण करेगा।

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आदरणीय सुरेश जी का ऊर्जस्वल व्यक्तित्व और सृजनशील कर्तृत्व सहज ही सहृदयों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। मैं स्वयं को भाग्यवान और पुण्यवान मानती हूं कि मुझे इनका आत्मीय सान्निध्य और स्नेह मिला है। बहुत ही सरल परिणामी, सहज और सहृदय व्यक्ति हैं। आपके पिता बहुत ही अनुशासन प्रिय, दबंग और निर्भय प्रकृति के थे एवं माता श्रीमती दुर्गा देवी में आध्यात्मिकता एवं भक्ति भाव कूट-कूट कर भरा था। माता-पिता से प्राप्त संस्कार आपके व्यक्तित्व को निखारने में मुख्य निमित्त बने। राष्ट्रकवि दिनकर कहा करते थे कि जीवन न केवल भावना है और न केवल बुद्धि; आदर्श मनुष्य वह है जिसकी बुद्धि और भावना दोनों में समन्वय होता है। मैंने सुरेश जी में भावना और बुद्धि का अद्भुत संतुलन देखा है। उन्होंने बुद्धि को उतना ही महत्व दिया है जब तक वह भावना पर आघात न करे।

इसे एक सुखद आश्चर्य ही कहा जाएगा कि सुरेश जी साहित्य के नहीं, विज्ञान के विद्यार्थी रहे। बचपन और युवावस्था में लेखन के प्रति विशेष रुझान नहीं था और न ही गंभीरता से लिखने का कभी प्रयास किया। किंतु नियति की योजना ने अकस्मात उनके जीवन की दिशा बदल कर साहित्य सृजन की ओर उन्मुख कर दिया। 2006 में गंभीर रूप से अस्वस्थ होने पर, जीवन के उत्तरार्ध में 2011 से — लगभग 59 वर्ष की उम्र से — साहित्य सृजन प्रारंभ किया और उसके बाद कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2011 से लेकर 2024 तक मात्र 13 वर्षों की अवधि में उन्होंने विपुल मात्रा में साहित्य सृजन किया है जिसे देखकर कोई भी दांतों तले उंगली दबा सकता है। उनमें प्रतिभा की प्रखरता है और अध्ययनशीलता का गांभीर्य है। मैं उनके दिव्य व्यक्तित्व और साहित्य के कुछ बिंदुओं को रेखांकित करना चाहूंगी —

आध्यात्मिक ऊर्जा के अक्षय स्रोत

आपने अपने जीवन में आध्यात्मिकता को सर्वोपरि स्थान दिया है। अध्यात्म उनके प्रत्येक विचार और व्यवहार में प्रतिबिम्बित होता है। इनकी अधिकांश रचनाएं पाठकों के हृदय में आध्यात्मिकता का संचार करती है।

ढाई आखर प्रेम का

जीवन की पहली पाठशाला परिवार होता है। घर परिवार में अनेक लोग रहें और एक दूसरे से प्रेम न करें तो जीवन जड़वत है। जीवन होने के बाद भी वहां मुर्दानगी छाई रहती है। वस्तुतः घर परिवार का मूल प्राण है — प्रेम। इस तथ्य को आपने गहराई से हृदयंगम किया है। आपने अपने परिवार में ऐसा वातावरण बनाया है कि लोग एक दूसरे से प्रेम करें। मैं समझती हूं कि उनके जीवन की सुंदरता और भव्यता का राज है कि उनके घर परिवार के प्रत्येक सदस्य के बीच प्रेम है। प्रेम उनका आंतरिक आधार है। इनकी कविताएं प्रमाण है कि ये परिवार जनों की कद्र करते हैं, उनके गुणों को समझते हैं एवं उनकी प्रशंसा करने में कभी भी कोताही नहीं करते। अपने आदरणीय माता-पिता की जन्म तिथि एवं पुण्यतिथि पर प्रतिवर्ष कविता के माध्यम से उन्हें भावांजलि समर्पित करते हैं। अपनी माता स्वर्गीया दुर्गा देवी चौधरी की स्मृति में तो प्रति माह काव्य पाठ का आयोजन करते हैं जिसमें महानगर के वरिष्ठ कवियों को आमंत्रित कर काव्य पाठ किया जाता है। पूज्य माताश्री को समर्पित एक कविता की बानगी देखिए —

गीता सी पवित्र और पूजनीय हो मां तुम, / नैनकौर के नीर सी अतुलनीय हो मां तुम। / चिर आनंद प्रतीक प्रातः स्मरणीय हो मां तुम / आलोक प्रदायनी आति वंदनीय हो मां तुम॥

एक अन्य कविता में मां के प्रति श्रद्धा इस प्रकार व्यक्त हुई है —

प्रथम गुरु बन ज्ञान दिया बचपन में, / तू प्रेरक सुरभित पुष्प उपवन में। / आशा की एक लौ जली है मन में, / तू है एक नूतन आस्था जीवन में। / तू पूजा तू ही मंदिर / तू ही देव / तू ही देवालय / तू ही ज्ञान सदैव।

बेटी पर केंद्रित ‘पितृ मन’ शीर्षक से रचित कविता मन को भावाभिभूत कर देती है —

सुन री मोरी सोन चिरैया / काहे तूने नेहा लगाया / मोह माया से परे था मैं / काहे तूने मोहे फसाया / तेरे मस्तक को स्नेहिल हाथों से / सहलाऊं मन करता / सहमी सी चिरैया को नई सुबह / दिलाऊं मन करता / शीघ्र उड़ान भर गगन की ऊंचाई / नाप लो मन में आया

इनकी सहधर्मिणी श्रीमती शारदा जी सदैव छाया की तरह इनके साथ रहती है। अपने विवाह की प्रत्येक वर्षगांठ एवं शारदा जी के जन्मदिन पर आपकी काव्य धारा प्रस्फुटित हुई है। विवाह की वर्षगांठ के उत्सव पर ‘कुछ माणिक कुछ मोती’ काव्य पुस्तक तो पत्नी को ही समर्पित की है। हृदय की गहराई से निकली कितनी भावपूर्ण पंक्तियां हैं —

पंथ कंटक था सुमन बिछा कर / कोमल बनाया तुमने / मन विग्रह निग्रह से विचलित था / कुमुद खिलाया तुमने / सुख-दुख में बन आलम्ब क्षण-क्षण / साथ निभाया तुमने / वर्षों पूर्व जो वचन लिए थे निभाना सिखाया तुमने

सुरेश जी के निर्मल स्नेह की यह धारा अपने मित्रों एवं समाज बंधुओं के प्रति भी सहज रूप से प्रवाहित है। मित्रों के सुख में सुखी होते हैं और उनकी पीड़ा उन्हें व्यथित करती है। अपनी असीम ऊर्जा को अपने समाज बंधुओं के संग साथ सावधानीपूर्वक, सजगतापूर्वक खर्च करते हैं। प्रेम, इंसानियत और सामाजिकता की जुगलबंदी ही इनकी व्यापक स्वीकार्यता और खुशहाली का राज है।

निरहंकारिता

आप विविध संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान, पुरस्कार, उपाधियां, अभिनंदन एवं प्रशस्ति प्राप्त कर चुके हैं। मंच पर काव्य पाठ के लिए देशभर से आमंत्रण आते हैं। कोलकाता महानगर ही नहीं, देश-विदेश के साहित्यकारों के बीच आप आदरास्पद हैं। इतना यश प्राप्त करने के बाद भी अहंकार आपको छू तक नहीं गया है। जिस प्रकार फलों से लगा हुआ वृक्ष झुक जाता है, उसी तरह उपलब्धियों ने सुरेश जी को और अधिक विनम्र बनाया है। मेरा विश्वास है कि थोड़े या अधिक समय के लिए जिन लोगों ने उनको देखा या सुन लिया, वे उन्हें कभी भी विस्मृत नहीं कर पाएंगे।

सहनशीलता

सुरेश जी की देह में सभी बीमारियों ने घर जमाया है। कूल्हों का प्रत्यारोपण, हृदय रोग, दांतों एवं आंखों की बीमारी, डायबिटीज, मयासथेनिया आदि अनेक रोगों से इनका शरीर आक्रांत है। विगत 1 वर्ष से कर्क रोग से भी पीड़ित हो गए हैं। एड़ी से चोटी तक दर्द ही दर्द है। भयंकर बीमारियों एवं प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद आपने कभी भी स्वयं को हताश, निराश नहीं होने दिया। जीवन में आने वाली हर विपरीत परिस्थिति को एक चुनौती की तरह स्वीकार किया और अपनी कुशलता से, सर्जनात्मकता से एक उपलब्धि के रूप में परिवर्तित कर दिया। ‘जो होगा सो होगा, जो होना होगा वही होगा’ — ये पंक्तियां उन्होंने अपने मन मस्तिष्क में अंकित कर रखी हैं। दुःख, दैन्य और दुर्बलता से मुक्त रहकर हर परिस्थिति में एक कर्मयोगी की तरह जीवन जीते हैं। वर्तमान समय में जब मनुष्य का धैर्य बिल्कुल चुक गया है, आपकी सहिष्णुता सबके लिए प्रेरक है।

साहित्य में मूल्यबोध

आपने अपने साहित्य के माध्यम से जीवन मूल्यों को स्थापित करने का प्रशस्य उपक्रम किया है। मूल्य संस्कृति, समाज और राष्ट्र का विकास ही नहीं करते, उन्हें सार्थकता भी प्रदान करते हैं। सुरेश जी का मूल्य बोध अत्यंत व्यापक, गहन और तलस्पर्शी है। वे मानते हैं कि मूल्य यदि जीवन के साथ नहीं जुड़ते अथवा मानवीय उत्कर्ष के साथ स्वयं को नहीं जोड़ते तो वे मूल्य नहीं हो सकते। भारतीय सांस्कृतिक मूल्य, नैतिक आदर्श एवं मानव मन के भावों की बहुत ही सहज अभिव्यक्ति आपके साहित्य में हुई है। आपका मत है कि मूल्यों का ह्रास उतना चिंताजनक नहीं जितना कि मूल्यों के प्रति विश्वास का उठना समस्या पैदा करने वाला है। ह्रास को विकास में बदला जा सकता है, पर विश्वास उठने का मतलब है अपने अस्तित्व को नकारना। अपने साहित्य के माध्यम से सुरेश जी ने उन्हीं मूल्यों को छुआ है जो देश, काल, समाज और परिवार सापेक्ष है। उनकी एकमात्र अभीप्सा है कि मानव मन की अशान्ति दूर हो और वहां प्रेम, दया, करुणा, समता, परोपकार आदि मानवीय गुणों का विकास हो। साहित्य के माध्यम से नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा करके वे समाज का सांस्कृतिक जागरण करना चाहते हैं। राम, कृष्ण, शिव एवं अन्य पौराणिक चरित्रों के माध्यम से मूल्यों एवं मानवीय गुणों को उभारा है। वे धर्म को शाश्वत मूल्य के रूप में स्वीकार करते हैं। वे सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, सरलता, अभय, अनुशासन, मर्यादा, विनम्रता और परमार्थ वृत्ति को महत्वपूर्ण मानवीय मूल्य मानते हैं, जिनके बिना व्यक्ति अपने अस्तित्व को सुरक्षित नहीं रख पाएगा। कवि की निश्चित मान्यता है कि दूसरों को दुःख पहुंचाने वाला व्यक्ति कभी स्वयं प्रसन्नता और आनंद का जीवन जी नहीं सकता। सामाजिक मूल्यों के संदर्भ में निम्न पंक्तियां कितनी प्रेरक हैं —

जो दुःख हर दूसरों का जीता, / वही मनुज आते हैं याद मृत्युपरांत / आत्मा उनकी इस लोक भी — उस लोक भी, / कर परमार्थ हो कांत / सुधा पान कर अमरत्व नहीं होता प्राप्त, / कर दीन की सेवा महान / प्रसन्नता मिलती पहचान कर, / स्वयं का विश्व के प्रति योगदान। / सुखमय जीवन करती उसकी उदारता, / जिसने भी बांटा निष्काम / आशीर्वाद ले दीन दुखियों का, / संसार का यह सबसे बड़ा सत्काम।

कहा जा सकता है कि उनके साहित्य में मानवीय मूल्य सर्वत्र स्पंदित हुए हैं।

विसंगतियों पर प्रहार

अपने सिद्धांतों और आदर्शों के साथ समझौता सुरेश जी को कभी भी स्वीकार नहीं हुआ। अपनी रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों एवं विडम्बनाओं पर खुलकर प्रहार किया है। स्थान-स्थान पर इन्होंने भोगासक्त जनता को प्रतिबोध दिया है कि विषय वासना में मग्न मानव कभी आनंद और आंतरिक प्रकाश की अनुभूति नहीं कर सकता। काम भोग मनुष्य की चेतना को विकृत करके अतृप्ति की आग को भड़काने वाले हैं। अतृप्ति और अधर्म के गलियारे से होकर आता अर्थ इन्हें कदापि स्वीकार नहीं। द्यूत, हिंसा, मद्य और व्यभिचार के विरुद्ध कवि का आक्रोश इस प्रकार फूट पड़ता है —

अहितकर अर्थ कामना / लोलुपता है यह भ्रष्टाचार, / परिमार्जन कर स्वयं को / हटाना है यह अत्याचार। / शास्त्रों में बताया है कलि के / अवतरण के प्रकार

अधर्म का अर्थ द्यूत, हिंसा, मद्य और व्यभिचार — कवि का स्पष्ट मत है कि वही कार्य करना चाहिए जो इहलोक और परलोक में सुखदाई हो।

अगाध राष्ट्रभक्ति

आपका हृदय राष्ट्र भक्ति और भारतीयता की भावना से आप्लावित है। इस देश के सभी संतो, मनीषियों, वीर, वीरांगनाओं और महापुरुषों के प्रति आप अत्यंत श्रद्धा भाव रखते हैं। महाराणा प्रताप, राणा सांगा, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेई, चंद्रशेखर आजाद आदि महापुरुषों के चरणों में अपनी काव्यमय विनयांजलि समर्पित की है। भारतरत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई को समर्पित पंक्तियां मननीय हैं —

अटल अटल है, / अटल उनका अटल आत्मविश्वास / भारत का सच्चा रत्न है गर्वित हो गया इतिहास / राजनीति के मंच पर सदा रहे दुश्मन भी मित्र / एकमात्र निर्विवाद व्यक्तित्व उत्कर्ष रहा चरित्र

‘स्वाभिमान’ शीर्षक कविता में राणा सांगा के प्रति कवि ने भाव भरा अर्घ्य समर्पित किया है —

अस्सी घाव लगे थे तन में, / नव उमंग थी फिर भी मन में / अपनी अस्मिता बचाने को / मर मिटने की ठानी रण में

देश भक्ति के भावों से ओतप्रोत ऐसी असंख्य कविताएं हैं जो भारत, भारतीयता, भारतीय संस्कृति, धर्म, अध्यात्म तथा भारतीय भाषाओं के प्रति कवि के गहन लगाव को दिग्दर्शित करती हैं।

भाषा सौष्ठव

कवि का शब्द भंडार जितना समृद्ध होगा उतनी ही उसकी भाषा शैली समृद्ध मानी जाएगी। सुरेश जी का शब्द भंडार इतना समृद्ध है कि गूढ से गूढ भावों को सरलता से प्रकट करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती। उनकी भाषा जीवन के साथ जुड़ी हुई है, अतः सीधा हृदय को स्पर्श करती है। प्रथम दृष्टि में कहीं-कहीं उनकी भाषा क्लिष्ट, दार्शनिक, समासबहुल लगती है, लेकिन गहराई से देखने पर स्पष्ट हो जाएगा कि आप भावानुकूल शब्द प्रयोग के कुशल चितेरे हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी की यह उक्ति — ‘शक्तिशाली कवि शब्दों की नाड़ी पहचानते हैं’ — सुरेश जी के शब्द चयन कौशल पर चरितार्थ होती है। कविता में शब्द चयन की पटुता से ही ध्वन्यात्मकता और नाद सौंदर्य उत्पन्न होता है। कह सकती हूं कि आप शब्दों के जादूगर हैं। आपकी शब्द योजना बहुत उपयुक्त, नैसर्गिक और विषयानुरूप होती है।

काव्यानुवाद

अनुवाद सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमुख कारक तत्व है। किसी भी कृति का अनुवाद किसी ग्रंथ लेखन से कम परिश्रम का कार्य नहीं। गद्य की अपेक्षा पद्यानुवाद अधिक कठिन है क्योंकि इसमें शब्दों का सम्यक चयन करना होता है। आदरणीय सुरेश जी ने अनेक संस्कृत पद्यों एवं स्तोत्रों का काव्य में भावानुवाद किया है। अनुवाद में कहीं-कहीं प्रसंगानुसार परिवर्तन और परिमार्जन भी किया है। उनका अनुवाद सटीक और मूल भावों को अक्षुण्ण रखने वाला होता है।

प्रकृति प्रेम

मानव जीवन के साथ प्रकृति का आत्मीय संबंध है। सुरेश जी का प्रकृति के प्रति प्रेम अत्यंत परिष्कृत है। विविध स्थानों का पर्यटन करने के कारण प्रकृति के सहज रमणीय सौंदर्य को देखने का अवसर इन्हें मिला। प्रकृति अपनी सजीवता, ताजगी और सौंदर्य से उन्हें आकृष्ट करती है। सभी ऋतुओं के सजीव चित्र कवि ने उकेरे हैं। वर्षा ऋतु का एक मनोरम चित्र देखिए —

पावस की यह प्रथम जल धार अरे / हिय स्पंदित भिगो भिगो तार करे / चंचल विभावरी सकल मेघ गर्जन / झंकृत बदन और मन मल्हार करे

ग्रीष्म ऋतु की प्रचंडता की निम्न अभिव्यक्ति बहुत ही सुंदर बन पड़ी है —

प्रचंड तेजोमय तरुण भास्कर कर / रहा ऊष्मित अवनि तन को / अर्ध निशा का शीतल विधु / उद्वेलित कर रहा शांत मन को / तृषित नयन तृषित प्रिया के दग्ध विरह में / ढूंढ रहे सजन को / मन्मथ वेग भी हुआ शांत है / तप्त निदाघ में प्रिय मिलन को

प्रकृति को समानुभूति के रूप में प्रस्तुत करने के कारण उनकी प्रकृति भी मानव के सुख में सुखी तथा दुख में दुखी होती है।

सारांशतः कह सकती हूं कि अपने उच्च विचारों और अद्भुत सृजन कौशल से सुरेश जी ने अपने व्यक्तित्व को शिखर की ऊंचाई तक पहुंचा दिया है। उनका व्यवहारिक जीवन सद्गृहस्थों के लिए प्रेरक है। उनका जीवन एवं साहित्य जनजीवन को प्रतिबोध देकर नई रोशनी विकीर्ण करेगा, ऐसा विश्वास है। मैं कामना करती हूं कि वे स्वस्थ रहें, शतायु हों और अपनी सृजनात्मकता से मां भारती को समृद्ध करते रहें।

स्नेहलता बैद
स्नेहलता बैद
सुप्रसिद्ध समाजसेविका एवं संपादक — कल्याण भारती
कोलकाता, पश्चिम बंगाल
पुस्तक समीक्षा

इन्हीं शब्दों के साथ मैं मित्र सुरेश चौधरी को शुभेच्छा देता हूँ, उनके इस प्रयास की प्रशंसा करता हूँ। इस पुस्तक से आम जन में बैठे कई भ्रम दूर होंगे, ऐसी आशा है।

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भ्रम एवं भ्रांतियां — अनेकानेक भारतीय संदर्भों में चल रही भ्रांतियों के निराकरण के निमित्त सुरेश चौधरी ने ये पुस्तक संकलन रूप में लिखी है।

मेरे परम मित्र, विद्वान लेखक, शोधकर्ता एवं चिन्तक श्री सुरेश चौधरी जी ने एक पुस्तक की रचना की है — ‘भ्रम एवं भ्रांतियां’। अनेकानेक भारतीय संदर्भों में चल रही भ्रांतियों के निराकरण के निमित्त, उस मंशा से उन्होंने ये पुस्तक इस संकलन रूप में लिखी है।

इन विषयों पर बहुत सारे विद्वानों ने — धर्मपाल से लेकर दयानंद सरस्वती और अनेक विद्वानों ने, और कई विदेशी विद्वानों ने भी — अनेक नई खोजें करके यह सिद्ध किया है कि भारत धर्म एक जीवन पद्धति है, जिसे वर्तमान न्यायालय ने भी माना है। भारतीय संस्कृति ने तो इसे समानान्तर कर लिया, सामंजस्य बिठा लिया। वो बहुत तप पूर्वक, लंबी शोध पूर्वक, सामाजिक अनुभवों को साथ लेकर यहाँ तक पहुंचे और अंग्रेज़ मुक्त हो गए।

किसी प्रकार की मदद का कोई दुराग्रह न रखते हुए, हम पूरी दुनिया में जो श्रेष्ठ है उसका स्वीकार करते हुए, और भारतीय जीवन पद्धति जो वर्तमान में भी जारी है — वर्तमान में भी यही परिवेश ने सबको साथ लेकर एक समेकित जीवन पद्धति जीने का एक ऐश्वर्य आधारित और ज्ञान आधारित कल्पना की। यह सर्व स्वीकृत भी हो, एक तरीका विकसित किया जाए — इतने का प्रयत्न, जिसे हमेशा ही चलता रहे, वैसे आज भी चलता है।

लेखक की इस पुस्तक को कल लगभग तीन चार घंटे बैठकर मंथन चल रहा था, तो उन्होंने भी आग्रह किया। मेरे साधक के मन ने आया कि इस पर जगह जगह कुछ टिप्पणी करने योग्य है। इससे पुस्तक के इस मूल कथानक को मूल भी मिलेगा, और कहीं कहीं साधक जो थोड़ा सा असहमत भी है अपने मित्र से — और ये ऐसी असहमतियां आपस में स्वीकृत हैं…

इन्ही शब्दों के साथ मैं मित्र सुरेश चौधरी को शुभेच्छा देता हूँ, उनके इस प्रयास की प्रशंसा करता हूँ। इस पुस्तक से आम जन में बैठे कई भ्रम दूर होंगे, ऐसी आशा है।

डॉ. उम्मेद सिंह बैद
डॉ. उम्मेद सिंह बैद
प्रख्यात दार्शनिक — दर्शन शास्त्र, जैन दर्शन, वेद एवं गीता
५० से अधिक पुस्तकों के लेखक
विश्लेषण

सुरेश चौधरी जी ज़मीन से जुड़े इन्सान हैं जो सबको केवल स्नेह और प्यार ही बाँटते हैं। हैरानी होती है कि जो इन्सान चार्टर्ड अकाउण्टेण्ट के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करता है, वह अपने बाद के दिनों में केवल साहित्य को समर्पित होकर कैसे रह जाता है।

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कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिन्हें आप कभी आमने-सामने नहीं मिले होते, मगर उनके लिये आपके दिल में अपार आदर एवं सम्मान होता है। भाई सुरेश चौधरी एक ऐसा ही व्यक्तित्व हैं। मेरी उनसे पहचान केवल उनके लेखन के जरिये है और संपर्क सोशल मीडिया के माध्यम से।

सुरेश भाई रहते तो कोलकाता में हैं, मगर उनकी शख़्सियत की खुशबू भारत की सीमाओं के पार विदेश तक फैली हुई है। इक बेतुक समय में जब कविता और गद्य में कोई अंतर दिखाई नहीं देता, भाई सुरेश चौधरी लगातार छंद में न केवल लिख रहे हैं बल्कि अपने समूह रचनाकार के साथियों को भी छंद लिखने के लिये प्रेरित करते रहते हैं।

भाई सुरेश चौधरी के लेखन की निरंतरता एवं प्रचुरता उन्हें अन्य साहित्यकारों से अलग रेखांकित करती है। उनकी एक विशेष उपलब्धि इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज है — दरअसल उन्होंने 1160 दिनों में एक हजार भजन लिखे। ऐसी विलक्षण प्रतिभा के धनी सुरेश चौधरी में घमण्ड नाम मात्र का भी नहीं है। वे जमीन से जुड़े इन्सान हैं जो सबको केवल स्नेह और प्यार ही बांटते हैं।

हैरानी होती है कि जो इन्सान चार्टर्ड अकाउण्टेण्ट के रूप में अपने कैरियर की शुरूआत करता है, वह अपने बाद के दिनों में केवल साहित्य को समर्पित हो कर रह जाता है। 14 जुलाई 1952 को जमशेदपुर में जन्मे सुरेश चौधरी 2011 में अपने कैरियर के शिखर पर पहुंच कर सेवा निवृत्त हो जाते हैं और अपना बाकी जीवन साहित्य सृजन के नाम कर देते हैं। जाहिर है कि साहित्य के बीज उनके व्यक्तित्व में बचपन से रहे होंगे, जिनको उनकी कैरियर ने कहीं दबा कर रखा होगा।

सुरेश चौधरी ने अपने आपको कविता की किसी एक विधा तक सीमित नहीं रखा। दोहे और गीत के अलावा वे हाईकु, मुक्त छंद, छंद मुक्त, बाल कविता के साथ-साथ आध्यात्मिक आलेख आदि लिखने में भी सक्रिय रहे। उनमें विशेषता यह है कि वे साहित्यिक सृजन के अलावा अपने सोशल मीडिया समूह को भी सुचारू ढंग से चलाने में निपुण हैं।

वे अपने से वरिष्ठ एवं कनिष्ठ सभी के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हैं। उनका छंदों का ज्ञान अद्भुत है। जितने छंदों के नाम आम हिन्दी साहित्यकार को मालूम भी नहीं होंगे, उससे अधिक छंदों में वे रचनाएं लिख चुके हैं। उन्होंने गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर के 68 गीतों को देवनागरी में छंदबद्ध रूप में अनुवाद किया है। उनकी कलम आर्थिक मुद्दों पर भी उसी शिद्दत से चलती है जिस प्रकार साहित्यिक सृजन में।

सुरेश चौधरी अपनी राजनीतिक सोच के बारे में भी खुल कर बोलते हैं। आज के हालात पर वे भगवान शिव का आह्वान करते हैं:

हे चंद्रशेखर अब तो बाहर आओ कैलाश से, / कालकूट निकल रहा अब भारत प्रभास से, / हलाहल उष्मा को तजने शीतलता पाने को / फिर से शशि धारण करना होगा ललाट पे

सुरेश जी की कविताओं मे विषय वैविध्य साफ दिखाई देता है। वे किसी विचारधारा के दबाव में सृजन नहीं करते।

थोडा सा ग्रहण क्या लगा, तिमिर के प्रहरी ने सूरज को दीपक दिखाया है

सांझ होते ही जुगनुओं ने शहर में अपनी रौशनी का शोर मचाया है।

सुरेश चौधरी जी को लगभग दर्जन भर सम्मान एवं पुरस्कारों से नवाजा गया है। इनमें भारत सरकार के अलंकरण भी शामिल हैं और निजी संस्थाओं के भी। हम उन्हें यही कहना चाहेंगे — मंज़िलें और भी हैं, अभी उन्हें बहुत कुछ और लिखना है, प्रकाशित करवाना है और सम्मानित होना है। शुभकामनाएं!

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
एम.बी.ई. — कथाकार एवं संपादक
लंदन, यूनाइटेड किंगडम
पुस्तक समीक्षा

मुझे यह जानकर अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि मेरे शिष्य श्री सुरेश कुमार चौधरी ने माँ भगवती की आराधना के अद्वितीय ग्रन्थ श्री दुर्गा सप्तशती का पद्यानुवाद किया है। निश्चित ही यह दुष्कर कार्य माँ की कृपा के बिना सर्वसाधारण व्यक्ति को प्राप्त हो ही नहीं सकता।

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मुझे यह जानकर अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि मेरे शिष्य श्री सुरेश कुमार चौधरी ने माँ भगवती की आराधना के अद्वितीय ग्रन्थ श्री दुर्गा सप्तशती का, माँ जी की ही अहैतुकी कृपा से, पद्यानुवाद किया है। निश्चित ही यह दुष्कर कार्य माँ की कृपा के बिना सर्व साधारण व्यक्ति को प्राप्त हो ही नहीं सकता।

आद्य जगद्गुरु भगवान श्री शंकराचार्य जी ने ठीक ही कहा है — कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।

उसी प्रकार हमारी जगजननी माँ भगवती की किसी भी रूप में की गयी आराधना कभी व्यर्थ नहीं जाती है। मैं व्यक्तिगत रूप से सुरेश जी की परमपूज्या माताजी और पूरे परिवार से भलीभांति परिचित ही नहीं, बल्कि इनकी आध्यात्मिक साधना का प्रशंसक रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि सुरेश जी ने माँ भगवती की आराधना हेतु सर्व साधारण के लिए श्री दुर्गा सप्तशती का पद्यानुवाद करके अपनी माँ श्रीमती दुर्गादेवी चौधरी के नाम को सार्थक करके एक सच्चे सुपुत्र होने का प्रमाण प्रकट किया है।

इस पुण्य कार्य के लिए मैं उनकी ओर से तथा श्री भगवान ट्रस्ट ऋषिकेश की तरफ से पूरे परिवार को कोटि कोटि शुभाशीर्वाद प्रदान करता हूँ, और माँ भगवती के श्रीचरणों में विनम्र प्रार्थना करता हूँ कि श्री चौधरी परिवार को और शक्ति सामर्थ्य प्रदान कर आशीर्वाद प्रदान करें, ताकि यह परिवार ऐसे ही पुण्य कार्य करता रहे।

सप्रेम, शुभेच्छु

स्वामी साक्षी महाराज
स्वामी साक्षी महाराज
सांसद — उन्नाव, उत्तर प्रदेश
पुस्तक समीक्षा

पिछले कई सालों से सुरेश चौधरी जी संस्कृत के दिव्य भावों को लोक-कल्याण हेतु भाषाबद्ध करके सर्वदेशिक भावों से भर रहे हैं। सहज-सरल शब्द-शैली के पाथेय को परोसते — बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक — इनके विचार सराहनीय हैं।

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पिछले कई सालों से सुरेश चौधरी ‘इंदु’ के संस्कृत के दिव्य भावों को लोक कल्याण हेतु भाषा बद्ध करके सार्वदेशिक भावों से भर दिया है।

सहज-सरल शब्द शैली के पाथेय को परोसते — बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक — इनके विचार सराहनीय हैं।

अभी आप द्वारा अनुवादित ‘सुर तरंगिणी माँ जान्हवी’ मेरे पास आपने भेजी। आदि जगतगुरु शंकराचार्य जी द्वारा ‘श्री गंगा स्तोत्र’ पढ़ कर मन कृत्य-कृत्य हो गयो। हम नित्य पाठ तो करते हैं, पर लावणी छंद में पाठ करके आनंद आ गया।

‘गंगा वारी हे मनोहारी विष्णु चरण से निकल पड़ी’ — देवि सुरेश्वरी भगवती गंगे! पावन माँ भगवती तरंगा ने क्या वैभवदायी भाव भर दिए हैं।

दूसरी ‘गंगा लहरी’ का तो कहना ही क्या है, 52 श्लोक हैं, जब विष्णु पादाब्जभूता त्रिपथ गामिनी के किनारे खड़े होकर प. श्री जगन्नाथ मिश्र जी को निज अंक मे समा के ले गई, गंगा माँ।

जिस गंगा-लहरी का एक एक श्लोक भारतीय विद्वदजनों के मन मे समाहित है, सुरेश जी ने अनुवाद करके तो ‘समृद्धं सौभाग्यम्’ शब्द को चरितार्थ कर दिया।

‘सौभाग्य से सम्पूर्ण श्रुति के तत्व सुमन अपार की’ हरगीतिका छंद मे रस प्रवाहित कर दिया।

राजऋषि के वक्ष कस्तूरी — ये महिमा प्रणम्य है।

आपका अनुवाद इस तुमुल कोलाहल-कलह युक्त कलियुग में — कामायनी के शब्दों में ‘तपन मे शीतल मंद बयार’ — संस्कृत शिक्षा को समयानुकूल प्रगाढ़ अनुराग से भर देते हैं। आप एक निष्काम योगी की तरह अनेक ग्रंथों की सेवा मे लगे हैं, सुयश आपका बढ़ता रहे।

बालव्यास श्री कान्त शर्मा
बालव्यास श्री कान्त शर्मा
भागवताचार्य
कोलकाता
विश्लेषण

देश-विदेश के साहित्यकारों, कवियों और शायरों में सुरेश चौधरी साहब का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। वेदों, शास्त्रों और पुराणों पर गहन चिंतन-मनन इनकी रचनाओं में परिलक्षित होता है।

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सुखद आश्चर्य होता है कि वैज्ञानिक सोच वाला, अर्थशास्त्र में निष्णात कोई व्यक्ति न केवल धर्मशास्त्र और दर्शन शास्त्र में अच्छी पकड़ रख सकता है, बल्कि साहित्य की अनेक विधाओं में भी पारंगत हो सकता है। देश-विदेश के साहित्यकारों, कवियों/शायरों में सुरेश चौधरी साहब का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। वेदों, शास्त्रों और पुराणों पर गहन चिंतन-मनन इनकी रचनाओं में परिलक्षित होता है। भारतीय आमजन के सुख-दुख और झंझावातों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तो इनकी रचनाओं का मूल आधार है ही, भक्ति भाव से ओतप्रोत इनके सैकड़ों पद भी पाठक को रस सिक्त करते हैं।

चार्टर्ड अकाउंटेंट, समृद्ध कारोबारी सुरेश चौधरी साहब से करीब 10 वर्ष पूर्व सोशल मीडिया के माध्यम से ही मेरा परिचय हुआ, लेकिन आपकी सदाशयता और आत्मीयता ने इस परिचय को धीरे धीरे पारिवारिक संबंध में तब्दील कर दिया। बड़भागी हूं कि सुरेश चौधरी साहब मुझे अनुज समान स्नेह करते हैं।

72 वर्षीय सुरेश चौधरी साहब इस उम्र में भी भिन्न-भिन्न विधाओं में अपने रचना कर्म और सोशल मीडिया पर तो सक्रिय रहते ही हैं; अन्य साहित्यकारों को आगे लाने वाला इनका जज़्बा प्रेरणादाई है। प्रभु से आपके स्वस्थ दीर्घ आयुष्य की कामना करता हूं। सादर,

दीक्षित दनकौरी
दीक्षित दनकौरी
सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार
शब्द-चित्र

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि चौधरी जी ने लीक से हटकर एक असाधारण बुद्धि और साहस का परिचय दिया है। ऐसी वित्तीय गतिविधियों में संलग्न रहते हुए साहित्य के बारे में लिखना तो दूर की बात है, पर सोचने भी वाला है।

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साहित्य और लेखन का कार्य हर किसी के बस की बात नहीं है। मैं इसे विशुद्ध माँ सरस्वती का प्रसाद मानता हूँ। मैं मेरी स्थिति के बारे में स्पष्ट करना चाहता हूँ, क्योंकि मैं भी छोटी-मोटी तुकबन्दी कर लेता हूँ। कभी-कभी खूब माथापच्ची करने के बाद भी दो लाइन नहीं लिख पाता हूँ, किन्तु जब माँ शारदे की कृपा होती है तो पूरी कविता या लेख एक ही झटके में लिख जाता हूँ। इसे मैं ऐसे लेता हूँ कि देवी सरस्वती की कृपा के बिना साहित्य का क्षेत्र सूना ही नहीं, शून्य है।

मुझे यह जानकर अति प्रसन्नता हुई कि श्री सुरेश जी चौधरी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर “प्रज्ञान विश्वम” जर्मनी से निकलने वाली पत्रिका में एक विशेषांक निकल रहा है, जिसका संपादन देश के जाने माने साहित्य मनीषी पण्डित श्री सुरेशजी नीरव कर रहे हैं।

मेरे मित्र श्री सुरेश जी चौधरी, जो मूलतः मेरे प्रदेश राजस्थान से ही हैं — एक विज्ञान स्नातक, फिर पेशे से चार्टेंड अकाउंटेंट का साहित्यकार होना भी एक अजूबे से कम नहीं है। चौधरी जी के पूर्वजों ने मरुभूमि से दूर देश के सुदूर पूर्व बंगाल और बिहार को अपनी कर्मभूमि अपनाया। सुरेश जी का जन्म स्वतंत्रता प्राप्ति के पाँच वर्ष बाद स्व. सेठ श्री भोलारामजी चौधरी और माता श्रीमती दुर्गावतीजी चौधरी के यहाँ जमशेदपुर में हुआ और वहीं पढ़-लिखकर कर्मक्षेत्र में प्रवेश किया। इन्होंने वित्तीय प्रबंधन में महारथ हासिल की। उसी के अनुरूप आपने विभिन्न कंपनियों और संस्थानों/संस्थाओं से जुड़कर अपनी कार्यदक्षता के कीर्तिमान स्थापित किए। ऐसी वित्तीय गतिविधियों में संलग्न रहते हुए साहित्य के बारे में लिखना तो दूर की बात है, पर सोचने में भी आता है। कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि चौधरी जी ने लीक से हटकर एक असाधारण बुद्धि और साहस का परिचय दिया है।

संयोगवश मैं भी भारत सरकार की वित्तीय और लेखा सेवा में रहा हूँ, और मैं जब तक सेवा में रहा, तब तक मैं साहित्य के बारे में कुछ भी नहीं कर पाया। यह हम दोनों में समानता है कि हम दोनों वित्तीय सेवाओं से जुड़े रहे और हम दोनों ही सेवानिवृत्ति के बाद साहित्य की ओर मुड़े। इस क्षेत्र में आते ही चौधरी जी साहित्यिक क्षेत्र में पूर्णकालिक जुट गए और अपनी पूर्व प्रवृत्ति के अनुरूप ही साहित्यिक क्षेत्र में भी सफलता के झंडे गाड़ दिए।

इस बीच इनका लेखन सनातन संस्कृति के उन्नयन की ओर लग गया, जिसमें इन्होंने बहुत गूढ़ और अनछुए पहलुओं की जाँच-पड़ताल की और यथासंभव तथा यथासाध्य प्रकाश में लाने के सार्थक प्रयास किए। आप कविता की विभिन्न विधाओं (हाइकु, मुक्त छंद, छांदस कविताएँ) में पारंगत हैं और बहुत सी सामाजिक, धार्मिक, बालोपयोगी आदि विषयों पर बहुत सी रचनाएँ/पुस्तकें लिखी हैं, जिनकी पाठकों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा भी की है।

आपने वर्ष 2011 में व्यवसायिक गतिविधियों को विराम देकर, अस्वस्थ होते हुए भी, साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न हो गए। अर्थात इलाज की दौरान ही लेखन की ओर मुड़े। मुड़े तो ऐसे मुड़े कि पिछे मुड़कर भी नहीं देखा। उसी का परिणाम है कि धर्मनिष्ठ सुरेश जी की कलम सनातन धर्म के लिए चली और खूब चली, बल्कि दौड़ क्या छलाँगें मारने लगी। तब से आपने बहुत से धार्मिक ग्रंथों के हिन्दी में अनुवाद किए हैं। साथ ही आप नियमित रूप से कविताएँ, आलेख आदि लिख रहे हैं। आध्यात्म, वैदिक सनातन दर्शन एवं आर्थिक विषयों पर शोध कार्य भी किए, जो देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होने लगे। ताजा टीवी और दूरदर्शन पर समय समय पर धार्मिक और आर्थिक विषयों पर चर्चाओं में भागीदारी निभाते रहे — जैसे वेद, उपनिषद, गीता आदि। इन्हें सरल भाषा में रूपांतरित करके मेरे जैसे भाषा से अनभिज्ञ लोगों को पढ़ने, समझने और सीखने के अवसर प्रदान किए।

आपका अनुवाद कार्य बहुत बृहद और शानदार रहा है; जैसे — 1. श्री दुर्गतिविनाशिनी, 2. श्रीमद्भागवत एवं वेदों के 101 सूक्तों पर आधारित छंदमुक्त प्रार्थनाएं, समीक्षा आदि, 3. वेद से वेदांत तकः मूल पाठ सहित, 4. उपनिषद, 5. आदिशंकर रसमाधुरी, 6. भजगोविन्दं, 7. महिषासुरमर्दिनी आदि सहित — और बहुत से ग्रंथों के सहज तथा सरल काव्य व भाष्य अनुवाद किए हैं।

काव्य विधा में भी आपने कीर्तिमान स्थापित किया है। आपकी कुछ कृतियाँ हैं — तिमिर ढलेगा, बुलबुले सी जिन्दगी, कुछ माणिक कुछ मोती, प्रांजलि, माँ, हे माँ, शून्य से शून्य तक आदि, तथा आसमान को छू लें (बाल गीत)। एक सरस बाल गीत पुस्तक आदरणीय सुरेश जी चौधरी के सानिध्य में मेरा और इनका एक साझा संकलन भी प्रकाशित हुआ है, जिसकी भूमिका प्रसिद्ध बालगीत समीक्षक श्री संजय जायसवाल, लखनऊ और आकाशवाणी, कोलकाता की उद्घोषिका सुश्री सविता पौद्दार ने लिखी है।

इन्होंने धार्मिक और सामाजिक विषयों के इतर दूसरी भाषाओं से भी हिन्दी में अनुवाद कार्य बहुत किया है। परम आदरणीय रविन्द्र नाथ टैगोर की गीतांजलि का हिन्दी में काव्यानुवाद बहुत ही सुंदर किया है।

मैं आशा ही नहीं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि हम इनके सारगर्भित, सुरूचिपूर्ण और सामयिक प्रकाशनों से आज तो लाभान्वित हो ही रहे हैं। इसके साथ ही आने वाली पीढ़ियाँ भी इस बृहद साहित्य भण्डार से ज्ञानार्जन कर सकेंगी। मैं इस बात से भी आश्वस्त हूँ कि आने वाले समय में बहुत से विद्यार्थी इनके साहित्य पर शोध कार्य करेंगे और इनकी साहित्यिक निधियों से बहुत कुछ सीख सकेंगे।

साहित्यिक आकाश में, दमके यथा दिनेश। / मरूधरा का रोहिड़ा, जुग जुग जिए सुरेश॥

मैं श्री सुरेश जी चौधरी के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूँ।

कल्याण सिंह शेखावत
साहित्यकार
राजस्थान
अभिमत

जिस प्रकार चौधरी जी ने ऋतुओं, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक विसंगतियों से लेकर मानव जीवन के सम्बन्धों तक और जीवन की हर उथल-पुथल को इन चतुष्पदियों में समेटा है और पृथक शीर्षकों के अंतर्गत रखा है, वह कवि के लिए निश्चित ही श्रमसाध्य कार्य है।

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श्री सुरेश कुमार चौधरी की पांडुलिपि ‘कुछ माणिक कुछ मोती’ हस्तगत हुई तो पढ़ना आरम्भ करते ही पहली बात जिसने मुझे प्रभावित किया, वह थी उनकी प्रत्येक चतुष्पदी में प्रयुक्त संस्कृतनिष्ठ शुद्ध, परिमार्जित एवम प्रांजल भाषा।

इधर कुछ वर्षों से निरन्तर हिंदी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द सम्मिलित होते जा रहे हैं और एक नई ही बोलचाल की भाषा कविता में दिखाई दे रही है। एक सीमा तक यह उचित और आवश्यक भी है — इससे हिंदी की स्वीकार्यता का दायरा व्यापक होने की सम्भावनाएं बढ़ती हैं; किन्तु दूसरी तरफ यह भी विचारणीय है कि इस प्रकार तो हमारी हिंदी का मूल स्वरुप ही विस्मृति के अन्धकार में चला जाएगा! अतः ऐसे समय में इस पुस्तक की भाषा बहुत ही प्रशंसनीय है!

जिस प्रकार श्री सुरेश कुमार चौधरी जी ने ऋतुओँ से लेकर राष्ट्रप्रेम और सामाजिक विसंगतियों से लेकर मानव जीवन के सम्बंधों तक और जीवन की हर उथल-पुथल को इन चतुष्पदीयों में समेटा है और पृथक शीर्षकों के अंतर्गत रखा है — वह कवि के लिए तो श्रमसाध्य कार्य है, किन्तु पाठकों को इससे मनोनुकूल विषय पर सामग्री पढ़ने में आसानी होगी!

उनका लेखन उत्कृष्ट है, स्वागत योग्य है! शब्द-शब्द सचमुच माणिक और मोती-सा अनमोल! इस पुस्तक हेतु मेरी शुभकामनाएं एवम् बधाई!

डॉ. सरिता शर्मा
डॉ. सरिता शर्मा
साहित्यकार एवं समीक्षक
शख़्सियत

श्री सुरेश चौधरी जी को जब भी देखती हूँ तो विस्मय से भर उठती हूँ। शायद विस्मय भी अवाक रह जाता होगा जब इनके व्यक्तित्व की ओर देखती हूँ। हर साथ चलने वाले साथी के जीवन की उष्मा को बदल देना — सहज, सरल सा, फूलों सा कोमल, लेकिन अपने विचारों में दृढ़।

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श्री सुरेशजी चौधरी जी को जब भी देखती हूं तो विस्मय से भर उठती हूं। शायद विस्मय भी अवाक रह जाता होगा जब इनके व्यक्तित्व की ओर देखती हूं। हर साथ चलने वाले साथी के जीवन की उष्मा को बदल देना — सहज, सरल सा, फूलों सा कोमल, लेकिन अपने विचारों में दृढ़ता; साथ में शामिल मिलता है फूलों का सौरभ।

प्रभु का सहारा लेकर अनेकानेक दोहों के कमल खिलाए, जीवन की सांसों मे कृष्ण के दर्शन के दीप जलाए, मां शक्ति की माला में शब्द-दर-शब्द गूंथते गए, अनुराग का रस बिखेरते हुए — हर समय, हर हाल में औरों के लिए हाज़िर रहते हैं। इनके साथ कुछ भी नहीं है अन्तिम विकल्प। इनकी महानता गीतों के स्वर में आबद्ध रहती है, तभी इनका मन हमेशा शांत रहता है।

सृजन करने वाले कलाकार में हमेशा एक विशिष्ट अलगाव रहता है, और जितना बड़ा कलाकार उतना बड़ा अलगाव होता है। इनकी विशिष्टता का कोई नाप-तोल नहीं। सचेतनता, जागरूकता इनकी अन्य विशिष्टता में शामिल हैं।

बहुत कुछ अनकहा रह गया। काश इनकी ज़िन्दगी किताब होती तो शब्द-दर-शब्द बयां कर देती — तभी तो कहा कि इनके लिए पूर्णता से कुछ कहने में स्वयं विस्मय भी अवाक रह जाता है। इनको मेरा नमन।

सरोज कौशिक
प्रख्यात उपन्यासकार
कोलकाता, पश्चिम बंगाल
व्यक्तित्व

चौधरी साहब खुशमिजाज किंतु गंभीर व्यक्ति हैं। सदैव वे सृजनशील रहते हैं और साहित्य से जुड़ी विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित करने में प्रयत्नशील रहते हैं।

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श्री सुरेश चौधरी जी ‘इंदु’ हिंदी के निरंतर सृजनशील रहने वाले कवि, लेखक और धार्मिक ज्ञाता हैं। जब मुझे ज्ञात हुआ कि सुरेश जी का एक ग्रंथ प्रकाशित होने जा रहा है तो मुझे खुशी हुई, और खुशी से ज्यादा आत्मिक संतोष हुआ — क्योंकि सुरेश जी की साधना बहुत बड़ी है; जितनी पुस्तकें कई लोग एक दशक में पढ़ भी नहीं पाते, उससे ज्यादा पुस्तकें उनकी प्रकाशित हैं।

चौधरी साहब की अनुवादित पुस्तक ही प्रायः 10 से ज्यादा हैं, जो कई मंत्रों व स्तुतियों का काव्यात्मक अनुवाद है। धर्म, वेद, वेदांत, उपनिषद् व धर्म से जुड़े विविध विषयों पर उनकी लेखनी सदैव चलती ही रहती है। इसके अतिरिक्त कुछ मौलिक काव्य संग्रह हैं, जैसे — तिमिर ढलेगा, बुलबुले सी जिंदगी, कुछ माणिक कुछ मोती, प्रांजलि, आसमान को छू लें, हे माँ, माँ, शून्य से शून्य तक इत्यादि। इन सभी कविताओं में उनका ईश्वरानुराग, धर्म के प्रति आस्था एवं कर्मठ समर्पित कर्तव्य परायण कवि का भावलोक प्रतिबिम्बित होता है।

स्वागत में जिसके हो प्रसन्न / निशा भी कुमुदिनी खिलाती है / जिसके अर्चन को रजनी भी / तारों के दीप जलाती है / उस रसिक बिहारी के दर्शन को / मेरी आँखें प्यासी हैं। / नित नित गीत बनाता हूं — / अलंकृत कविता अधूरी रह जाती है / निशा भी कुमुदिनि खिलाती है।

और दूसरी ओर वे कहते हैं —

मैं जीवन दंड-विधान हूँ / मैं निज आत्मसम्मान हूँ / मैं प्राण गति उत्थान हूँ / गौरव प्रतिष्ठा मान हूँ / मैं जगति का प्रतिकार हूँ, / इस पार हूँ उस पार हूँ / भरी भावनाएँ मुझमें— / मैं ही पूर्ण संसार हूँ

चौधरी जी से मेरा पहली बार मिलना करीब 12 वर्ष पूर्व हुआ था, जब मैं पूज्य दिनकर जी के आयोजित एक सभा में सम्मिलित होने कलकत्ता गया हुआ था। इस आयोजन के दूसरे दिन कुछ साहित्यिक मित्र, चौधरी साहब और मैं तकरीबन दो-तीन घंटे साथ रहे थे और इसी दौरान उनसे आत्मीयता की एक डोर बंध गयी थी। उन्होंने अपनी कुछ काव्य संग्रह मुझे भेंट किये और यह भी कहा था कि मैं आपके पितामह दिनकर जी से अत्यंत प्रभावित रहा हूँ।

इसके बाद फिर चौधरी साहब ने दिनकर जयंती पर आयोजित एक साहित्यिक समारोह में बुलाया, और इस यात्रा में उनसे ज्यादा निकटता हो गयी। मेरे सुख-दुःख में वे सदैव मेरे साथ रहते हैं और कमोवेश मेरा भी उनके प्रति ऐसा ही भाव रहता है।

दो वर्षों से उनके द्वारा स्थापित संस्था ‘रचनाकार’ और मेरे द्वारा स्थापित संस्था ‘दिनकर संस्कृति संगम न्यास’ सम्मिलित तौर पर साहित्य के क्षेत्र में दिनकर सम्मान देती है। चौधरी साहब खुशमिजाज किंतु गंभीर व्यक्ति हैं। सदैव वे सृजनशील रहते हैं और साहित्य से जुड़ी विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित करने में प्रयत्नशील रहते हैं। चौधरी साहब अपनी माता स्व. दुर्गावति चौधरी जी के प्रति अत्यंत आदर का भाव रखते हैं और उनकी स्मृति में भी कई आयोजन करते रहते हैं। माता-पिता के प्रति यह निष्ठा, यह सामीप्य परिवार का संस्कार होता है, जो उनके भीतर कहीं गहरे तक व्याप्त है।

ऐसे अप्रतिम निःस्वार्थ साहित्य साधक आजकल प्रायः नगण्य ही हैं। उनकी रचनाशीलता को प्रणाम। ईश्वर उन्हें लम्बा सुखी जीवन दें, यही कामना है।

डॉ. अरविंद कुमार सिंह
डॉ. अरविंद कुमार सिंह
सुपौत्र — राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’
व्यक्तित्व

सुरेश सर की सकारात्मक सोच किसी का हौसला पस्त नहीं होने देती, बावजूद इसके कि उनका स्वास्थ्य प्रायः उन्हें परेशान रखता है।

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ईश्वर कुछ लोगों को विलक्षण गुणों के आशीर्वाद के साथ धरती पर भेजते हैं; ऐसी ही प्रतिभा के धनी हैं आदरणीय सुरेश चौधरी सर। कोलकाता के साहित्यिक परिदृश्य से हम कतई परिचित नहीं थे; यह परिचय अभिभावक सम आदरणीय विनोद प्रकाश गुप्ता ‘शलभ’ सर ने करवाया था। उन्होंने सुरेश सर का परिचय एक राष्ट्रवादी कवि के रूप में दिया था।

सुरेश चौधरी सर से हमारा परिचय सुप्रसिद्ध गजलकार आदरणीय दीक्षित दनकौरी सर के माध्यम से 2018 में हुआ था। जब पहली बार सुरेश सर से किसी कार्यक्रम में भेंट हुई तो वे हमें अत्यंत सरल और विनोदप्रिय लगे। हम अपनी गजल प्रस्तुत कर रहे थे, तब मुख्य अतिथि के रूप में मंचासीन सुरेश सर को हमने ताल मिलाते देखा तो बहुत अच्छा लगा। उसके बाद यद्यपि कई कार्यक्रमों में मुलाकात हुई, किंतु अधिक संवाद स्थापित नहीं हुआ था।

वे एक साहित्यिक समूह की स्थापना का मन बना रहे थे और योग्य रचनाकारों की तलाश में थे; तब किसी ने उन्हें हमारे नाम का सुझाव दिया। इस दिशा में कुछ हो पाता, उससे पहले ही कोरोना ने दस्तक दे दी और शुरू हुआ ऑनलाइन कार्यक्रमों का सिलसिला। सुरेश सर के संयोजन और हमारे संचालन में एक के बाद एक अनेक सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुए। सुरेश सर लगातार मेहनत करते रहे। ‘रचनाकार — एक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्रांति’ की भारत के विभिन्न राज्यों और विदेशों में अनेक इकाइयों का गठन हुआ। सभी इकाइयां अपनी सक्रियता के चलते साहित्यकारों में अपनी पहचान बनाने लगीं।

सुरेश सर के परिचितों में बड़े नामी लेखकों, कवियों, शायरों के साथ साथ राजनेताओं, समाजसेवियों और उद्योगपतियों के नाम शुमार हैं। सर बहुत सहजता से उनको कार्यक्रमों में आमंत्रित करते रहे हैं। प्रथम वार्षिकोत्सव जमीनी तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया। जिस दिन कार्यक्रम तय हुआ, उस दिन कोलकाता में इतनी बारिश हुई कि ऑरेंज अलर्ट जारी कर दिया गया। तमाम परेशानियों के बावजूद कोलकाता के महापौर जनाब बॉबी हाकिम की अध्यक्षता में कार्यक्रम सम्पन्न हुआ और इतना सफल हुआ जिसकी आशा भी नहीं की जा सकती थी। सुरेश सर की सकारात्मक सोच किसी का हौसला पस्त नहीं होने देती।

उनका स्वास्थ्य प्रायः उन्हें परेशान रखता है। बार बार अस्पताल में भर्ती होकर ईलाज करवाना पड़ता है। साहित्य के प्रति उनका समर्पण उनकी ऊर्जा को घटने नहीं देता।

रचनाकार संस्था अपने तीन वार्षिक अधिवेशन सफलतापूर्वक पूर्ण कर चुकी है। इसके अतिरिक्त अनेक सांस्कृतिक एवं काव्य संध्याओं तथा नियमित रूप से स्व. दुर्गावती चौधरी स्मृति काव्यगोष्ठियों का आयोजन होता रहता है, जिनमें नवांकुरों से लेकर प्रतिष्ठित साहित्यकार अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।

सुरेश सर संस्था के सभी सदस्यों को अपने परिजनों जैसा मान देते हैं। हमारा सौभाग्य है कि हमें अपनी पुत्री मानते हैं और वैसा ही स्नेह भी देते हैं।

उनका सृजन कार्य अनवरत चल रहा है। प्रतिदिन एक भजन लिखकर ‘इंटरनेशनल बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में अपना नाम दर्ज करवा चुके हैं। भाषा और साहित्य के साथ-साथ उनके जैसा भारतीय दर्शन, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र और वेद-पुराणों का ज्ञान मुश्किल से ही पाया जाता है। इन विविध विषयों पर वे असंख्य पुस्तकें लिख चुके हैं। रचनाकार के पटल पर प्रत्येक रविवार ‘ज्ञानगंगा’ नामक कार्यक्रम प्रसारित होता है जिसमें वे धर्म, दर्शन, पुराणों, कर्मकाण्डों और संबंधित भ्रान्तियों पर चर्चा करते हैं तथा जिज्ञासुओं की शंकाओं का समाधान भी करते हैं। विषयों पर गहरी पैठ और उल्लेखनीय स्मरण शक्ति चकित कर देती है।

ईश्वर से प्रार्थना है कि वे स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों, उनकी कलम पर माँ सरस्वती की कृपा बनी रहे और उनका आशीर्वाद हमारे साथ सदैव बना रहे।

रचना सरन
रचना सरन
कार्यकारी अध्यक्ष — रचनाकार, एक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्रांति
सदस्य — पश्चिम बंग हिंदी अकादमी
शख़्सियत

सुरेश चौधरी जी ने साहित्य में अपनी उल्लेखनीय प्रतिभा का परिचय दिया है — दुर्गा सप्तशती का अनुवाद तथा रवींद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि सहित कई रचनाओं का हिंदी अनुवाद कर हिंदीभाषी पाठकों को पढ़ने का सुलभ अवसर प्रदान किया है।

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श्री सुरेश चौधरी उन विरले व्यक्तियों में हैं जो विज्ञान की डिग्री लेकर चार्टर्ड एकांउटैन्ट बने, एफसीए और डॉ. की। श्री चौधरी अग्रवाल वैश्य परिवार में 14 जुलाई, 1952 में पैदा हुए और उद्योगपति बन स्टील के कारखाने लगाए, जहां नव प्रयोग किये। साहित्य लेखन से पूर्व आप उषा आलायन्स स्टील में वित्त प्रबंधक और बिहार स्टील अलायंस में वाइस प्रेसिडेंट पदों को सुशोभित कर चुके हैं।

बीमारी से संघर्ष करते हाथों में कलम थाम कर माँ शारदे की कृपा से प्रौढ़ावस्था में लेखन को कार्यक्षेत्र बनाया। 2008 से 2011 तो वित्तीय सलाहकार रह चुके हैं। अभी भी सरकार को वित्तीय सलाह देते रहते हैं। पूरी तरह गृहस्थ का पालन करते अपने बच्चों को योग्य शिक्षा दी। आपकी बेटी वरिष्ठ डाक्टर है और दामाद वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट। सेवा भावी चौधरी जी कई सामाजिक और साहित्यिक संगठनों से जुड़े हुए हैं।

आपने साहित्य में भी उल्लेखनीय प्रतिभा का परिचय दिया है — दुर्गा सप्तशदी का अनुवाद, रवींद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि सहित कई रचनाओं का हिंदी अनुवाद कर हिंदी भाषी लोगों को पढ़ने का सुलभ अवसर प्रदान किया। वैसे आपकी लेखनी ऐतिहासिक ग्रन्थों पर शोध परक आलेख और छान्दसिक कविताओं की ओर रोशनी डालती है। अब तक दो दर्जन से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन कर चुके हैं। छन्दों में दोहे, विधाता, गीतिका, आल्हा, माधव मालती, सरसी, चौपाई आदि छन्दों में काव्य रचनाएं और पदावलिया में काव्य एवं आलेख (शोध वैदिक सनातन दर्शन) — आध्यात्म एवं दर्शन आपके रुचिकर विषय हैं, जिनपर निरन्तर लिख रहे हैं।

प्रकृति एवं वसुंधरा प्रेम पर आपके काव्य की बानगी देखिए —

जननी जन्मभूमि स्वर्ग से बढ़कर तुम हो। / है मातृभूमि यश आस्था बल प्रखर तुम हो॥ / रज का कण कण छन्दन शीश लगाता हूँ। / अनुपम पावन दृश्य देख इतराता हूँ॥

कई राज्य स्तरीय साहित्यक पुरष्कार और राज भाषा गौरव सम्मान से विभूषित श्री चौधरी जी इस उम्र में भी वेद पुराण और शास्त्रों का अध्यन कर शोध परक आलेख और काव्य का सृजन कर रहे हैं। अभी रामायण के प्रसंगों में लगभग चार दर्जन “मनका” लिख चुके हैं, जिनमें सीता-रावण संवाद, मकरध्वज पर शोध, नरान्तका वध आदि पर प्रभावी आलेख से नई रोशनी बिखेरी है।

सामयिक घटनाओं पर आपकी लेखनी अवश्य चलती है और शहीदों को श्रद्धांजलि देने से बिल्कुल नहीं चूकती। भारत पर पुलवामा हमले पर पुलवामा के हुतात्माओं को नमन करते 2019 में घटना के बाद लिखीं —

मेरी शान मेरी आन, / मेरी जान अर्पण तुझ पर करूं / मातृभूमि हेतु दिए प्राण / सर्व समर्पण तुझ पर करूँ / वीर मेरे सेनानियों / सर्वत्र तेरा वंदन होगा / जयति प्रहारक अरि संहारक / तेरा अभिनंदन होगा

केसर क्यारी क्यूँ रक्त रंजित हुई / क्यूँ अम्बर अंगार हुआ / क्यूँ शत्रु कमजोर मान रहा / लहु का क्यूँ अम्बार हुआ / वार करो अरिदल पर वर्जन / हो उनका क्रंदन होगा / जयति प्रहारक अरि संहारक / तेरा अभिनंदन होगा।

माँ के अश्रु, पत्नी का क्रंदन, / संतति का प्रलाप बचा / घर-घर आक्रोश मचा, / आंखों में शोणित आलाप बचा / पक्ष-विपक्ष रो रहा, / भारत सारा तुझ पर अर्पण होगा / जयति प्रहारक अरि संहारक / तेरा अभिनंदन होगा

आप साहित्य की अभिवर्द्धि हेतु प्रोत्साहन करते रहे हैं। प्रतिवर्ष अपनी माता की स्मृति में सत्यम सुन्द सृजन मेखला के श्रेष्ठ साधक को।

लक्ष्मण लड़ीवाला
लक्ष्मण लड़ीवाला
वरिष्ठ साहित्यकार
नज़रिया

रचनाकार ने विविध विषयों पर जिन कविताओं को अपनी इस कृति में संजोया है, वे काव्य-रसिक पाठकों को निश्चय ही पुलकित करेंगी।

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सहृदय साहित्य-साधक सुरेश कुमार चौधरी की काव्य कृति ‘कुछ माणिक कुछ मोती’ की रचनाओं से गुजरते हुए भाव एवं भाषा के अनूठे संगम का आनंद प्राप्त हुआ। रचनाकार ने विविध विषयों पर जिन कविताओं को इस कृति में संजोया है, वे काव्य-रसिक पाठकों को निश्चय ही पुलकित करेंगीं।

‘ईश वंदन’ एवं ‘हिंदी वंदना’ के उपरान्त प्रकृति एवं ऋतु केंद्रित रचनाएँ अपना इंद्रधनुषी रंग बिखेरकर पाठकों के हृदय में मानो रँगोली सजा देती हैं। इनमें ‘भोर की कान्ति’, ‘अनुपम दिवाकर’, ‘अर्धनिशा का सघन गगन’, ‘उषा का आगमन’, ‘गोधूलि की बेला’, ‘कोकिल की गूँज’, ‘शीतल पवन’ — आदि अनेक दृश्य हैं। कवि ‘निशा’ कविता में ‘विचित्र सजीव जीवन-अन्वेषण’ करता है तथा ‘निशि’ के तीन प्रहरों में ‘जीवन की गति’ का अनुभव करता है। पंक्तियाँ हैं:

बालपन-सा अपरिपक्व प्रथम प्रहर / ज्यों स्वतंत्र विहग नीड़ को अग्रसर / पूर्ण यौवन पर होती है मध्य रात / सघन स्वप्न और प्यार भरी / रात्रि का अवसान, देह गमन सामान / तन्हा-तन्हा बुढ़ापा, अंतिम समाधान / उषा का आगमन चली शीतल पवन / नवजीवन, नवसौरभ की नव छुवन!

सभी छः ऋतुओं के जो मनमोहक चित्र कवि ने उकेरे हैं, उनमे सूक्ष्म दृष्टि हैं, भाव-प्रवणता है और है प्रकृति-सुंदरी के प्रति अदम्य आकर्षण। वसंत का एक उल्लासपूर्ण चित्र दर्शनीय है —

स्वागतम-स्वागतम, नव वसंत सुस्वागतम / पीत-पीत वसुंधरा पोषित नव कुसुम अनुपम / पक्षी विचर रहे शुभ व्योम पर हर्षातिरेक / चहुँ दिशा नवोत्कर्ष छाया विशेष अभिषेक

इस रचना का समापन राष्ट्र चेतना को जागृत करने वाली पंक्तियों से होता है। कवि का संकल्प है — ‘प्रात की लालिमा से सुप्त राष्ट्र जगाना है / वसंत तो फिर मने अनाचार मिटाना है।’

अगला चरण राष्ट्र को समर्पित है, जिसका आरम्भ बंग भूमि की वंदना से है। परवर्ती रचना में ‘भारत-अस्मिता’ रेखांकित है। ‘राष्ट्रवेदना’ में कवि ने निर्भया काण्ड की वेदना को वाणी दी है। ‘केदार’ में देवभूमि में हुए खंडप्रलय का विनाशक दृश्य तो है, लेकिन यह ‘आकांक्षा’ भी है — ‘केदारेश्वर पर पुनः ॐ नाद हो, पुनः आल्हाद हो।’

दिसंबर 2012 में दिल्ली के दुर्भाग्यपूर्ण काण्ड पर कवि नारी समाज से आह्वान करता है — ‘हे नारी जाग तू, वासना के महिसासुर का संहार कर’। सामयिक प्रसंगों पर कवि की पैनी नजर है। सीमा पर दुश्मनों द्वारा वीर सैनिकों के सर काटे जाने का वह आक्रोश भरी वाणी में विरोध करता है और दृढ़ता के साथ कहता है कि ‘सहनशीलता की आड़ में कब तक चुप रहेंगे / हमने सीखा है जीना शान से’।

वह एक ओर मेवाड़ की बलिदानी माटी का स्मरण करते हुए ‘स्वाभिमान’ को जगाता है तो दूसरी ओर बैंगलोर के बम-विस्फोट पर त्वरित प्रतिक्रिया स्वरुप अपना क्षोभ व्यक्त करता है। अनीति-अधर्म के रास्ते अर्जित अर्थ हो या दहेज दानव की विनाशकारी लीला — कवि सुरेश चौधरी का आक्रोश सभी पर समान रूप से व्यक्त हुआ है। ‘आह्वान’ कविता में नई पीढ़ी से कवि कहता है —

जाति, धर्म और भाषा के झगड़े से देश बहुत बड़ा है / दे आहुति प्राणों की, ऋण मातृभूमि का शीश चढ़ा है / नव पीढ़ी कर कुछ कर्म ऐसा, जिस पर देश को गुमान हो / आनेवाला कल स्तुति गान करे, भगत सा तेरा मान हो।

अगले खण्डों में उत्सव-केंद्रित कविताएँ गीत-गजल समाहित हैं; माता, पिता तथा पुत्री पर चतुष्पदियाँ हैं, साथ ही विविध सन्दर्भों पर मार्मिक टिप्पणियाँ हैं। उत्कृष्ट भावों एवं परिनिष्ठित भाषा से संपन्न इस कृति में पाठकों को कहीं-कहीं छंद की शिथिलता खटक सकती है, लेकिन पुस्तक की कविताएँ रचनाकार की गंभीर पैठ की प्रतीति अवश्य करायेंगी — ऐसी मेरी धारणा है। मैं ‘कुछ माणक कुछ मोती’ कृति के प्रकाशन का स्वागत करता हूँ।

डॉ. प्रेम शंकर त्रिपाठी
डॉ. प्रेम शंकर त्रिपाठी
सुप्रसिद्ध साहित्यकार
कोलकाता, पश्चिम बंगाल
पुस्तक समीक्षा

यह पुस्तक इस बात की गवाह है कि परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत हों, अगर व्यक्ति की सोच सकारात्मक है तो वह परिस्थितियों का उपयोग स्वयं के हित में और समाज के हित में कर सकता है।

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देश के प्रतिष्ठित साहित्यकार, कोलकाता निवासी, श्री सुरेश चौधरी की लिखी हुई उपरोक्त पुस्तक कुछ दिन पहले प्राप्त हुई और मैंने कल पढ़कर समाप्त की। सुरेश चौधरी जी स्थापित उद्योगपति हैं, लेकिन 2011 से केवल लेखन कर रहे हैं और तब से अब तक 25 पुस्तकें लिख चुके हैं। कवि हैं, संस्कृत के विद्वान हैं, और छंद में महारत रखते हैं। अध्यात्म उनका मुख्य विषय है। लेकिन यह पुस्तक अलग है।

कहने को तो यह एक यात्रा वृतांत ही है, लेकिन जिन परिस्थितियों में यह यात्रा की गई वो अपने आप में अद्वितीय हैं। महान लोगों ने जेल की कोठरी में बंद रह कर अद्भुत किताबें लिखी हैं। सुरेश चौधरी जी की यह पुस्तक भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियों से निकली है, और यह इस बात की गवाह है कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों, अगर व्यक्ति की सोच सकारात्मक है तो वह परिस्थितियों का उपयोग खुद के हित में और समाज के हित में कर सकता है।

सुरेश चौधरी जी की यह यात्रा 6 महीने से अधिक के आरोपित अज्ञातवास के दौरान उनके भारत भ्रमण की देन है। यह अज्ञातवास किसलिए जरूरी हुआ, यह मैं यहां नहीं लिखूंगा। बस इतना ही कहूंगा कि कभी कभी नियति बहुत क्रूर और दुनिया अन्यायपूर्ण हो सकती है।

यह यात्रा कोलकाता से शुरू होकर बिहार, दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश से होते हुए कुल 6 महीने 17 दिन बाद कोलकाता में समाप्त होती है। इस दौरान जो भी घटित हुआ वह सब इस पुस्तक में है। इन सभी राज्यों में स्थित विभिन्न महत्वपूर्ण स्थानों, मंदिरों, पर्यटन केंद्रों का ब्यौरा उनके ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के साथ इतनी बारीकी से और इतनी सरलता से दिया गया है कि रुचि बनी ही रहती है। साथ में यह जिज्ञासा तो लगातार बनी ही रहती है कि इस यात्रा का समापन कहां और कैसे होगा।

चौधरी जी दिल से लिखते हैं, इसलिए उनको पढ़ना सुगम भी है और रोचक भी। परिस्थिति के अनुसार फिल्मी गीत, उनकी अपनी कविताएं, अन्य कवियों की रचनाएं — सभी कुछ शामिल है इस पुस्तक में। उनके सजीव चित्र तो हैं ही। काश ये चित्र रंगीन होते और थोड़े ज्यादा बड़े और स्पष्ट होते। टैक्सी, ऑटो के भाड़े, खाने की अच्छी जगह, लोगों का व्यवहार, हमारे पर्यटन केंद्रों का रख रखाव, सरकारों की जिम्मेदारी — हर चीज का बेबाकी से जिक्र है। क्योंकि ये सब जानकारियां किताबी नहीं बल्कि निजी अनुभव से निकली हैं, इसलिए वो रोचक हो जाती हैं।

मुझे घूमने का बहुत शौक नहीं है, फिर भी ऐसे कई स्थान हैं जिनके बारे में सुरेश चौधरी जी ने लिखा और जहां मैं जा चुका हूं। लेकिन उनको पढ़ने के बाद मुझे लगा कि मैंने तो वह सब देखा ही नहीं जो चौधरी जी ने देख लिया। यह उनकी नजर का कमाल है।

मगर इस पुस्तक का महत्व एक टूरिस्ट गाइड से ज्यादा जीवन के गाइड के रूप में दिखाई देता है। सूचनाओं की प्रवाहमय नदी की चंचल सतह के नीचे लगातार एक वेदना की अंतधारा बहती रहती है जिसे लेखक अपने हृदय में ढो रहा है। पंछी उम्र दराज है, अस्वस्थ भी है, थक रहा है, नीड़ को लौटना चाहता है, मगर उड़ते रहना उसकी मजबूरी है। फिर भी उड़ान का आनंद खुद भी लेता है और दूसरों के साथ बांटता भी है।

मंदिरों की नक्काशी, ऐतिहासिक किलों की भव्यता, महासागर में समाते सूर्य की सुंदरता के बीच से झांक रहा होता है सुरेश चौधरी का अदम्य साहस, अथक हौसला और जुझारूपन — जो इस पुस्तक को एक यात्रा वृतांत से कहीं अधिक बना देता है। वह इसे बना देता है एक संघर्ष की गाथा, कठिनाइयों पर साहस और जिजीविषा की विजय, और आपदा को अवसर में बदलने की सत्यकथा। एक उद्देश्यपूर्ण कृति के लिए सुरेश चौधरी जी को बधाई।

यशपाल सिंह ‘यश’
यशपाल सिंह ‘यश’
देश के प्रतिष्ठित साहित्यकार
कोलकाता
शब्द-चित्र

जीवन जीने की जिजीविषा, ज़िन्दगी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण — आपकी एक ऐसी निधि है जिसने ही आपके कर्मठ जीवन को लौ प्रदान की है।

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आदरणीय श्री सुरेश चौधरी जी एक कर्मयोगी पहले हैं, बाद में कोलकाता महानगर के वरिष्ठ साहित्यकार — यह कहते हुए अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि आपने कर्मठता के दिव्य स्वरुप को निखारा है, अपने दृढ़ संकल्प से, नेक इरादों से, गहन अध्ययन से; कर्म की निरंतरता में भरोसा रखते हुए फल की इच्छा न रखने वाले। यदि हम इस विराट व्यक्तित्व का अवलोकन करें तो वह हमारी समझ की परिधि में नहीं समाता — फिर भी एक कोशिश है।

सर्वप्रथम तो मैंने आपको कोलकाता महानगर के वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में ही जाना, लेकिन ज्यों-ज्यों आपका आत्मीय सानिध्य प्राप्त हुआ तब आपको साहित्य, संस्कृत, शास्त्रों, दर्शन, अर्थ आदि के प्रकाण्ड विद्वेत्ता के रूप में आपका परिचय मिला। आपकी रचनाधर्मिता कितनी प्रखर व समृद्ध रही है, यह उन्ही पाठकवृंद के समझने योग्य है जिन्होनें आपके साहित्य सागर में गोते लगाकर मोती चुने हों — हाइकू, छंद मुक्त, छंद बद्ध कविताएँ, भजन, अध्यात्म से लेकर देश की अर्थव्यवस्था पर गहन चिंतन तक के लगभग प्रत्येक विषय पर आपकी जागरूक लेखनी चली है। बाल साहित्य को संपन्न करते हुए बालमन को भी उन्मुक्त गगन प्रदान किया है। उम्र के इस पड़ाव पर बचपन का अल्हड़पन आज भी कवि के मन में बसता है, तभी तो कोई भी विधा रही हो, अनछुई नहीं रही।

एक आर्थिक सलाहकार होने के कारण विभिन्न पहलुओं पर सूक्ष्म विवेचना कर अपने ज्ञान की सिद्धहस्ता प्रस्तुत की है — देश की जी डी पी, बजट, देश की सुरक्षा का विषय हो, सभी पर निरंतर प्रकाश डालते आए हैं। दर्शन, वेदों, शास्त्रों को जनमानस तक पहुँचाने के लिए आपका श्रमसाध्य नमनीय है। साहित्य, संस्कृति सरल, सुगम, बोधगम्य हो नव पीढ़ी हेतु — उसके लिए भागीरथी श्रम किया है। समय समय पर वेदों की, श्रुतियों की अन्य विद्ववत जन के साथ आभासी व धरातल के पटल पर परिचर्चाएँ आयोजित करवाने का सार्थक प्रयास जारी करवाते रहे हैं; यह आपकी भीतर की उद्वेदलना का परिचायक है। आध्यात्म व धर्म पर आधारित पुस्तकों का सहज, सरल भाषा में अनुवाद, उपनिषदों पर गूढ़ चिंतन कर पाठकों के समक्ष लाना एक प्रगतिवादी विचारधारा का अनुशीलन है।

राजनीति की उठा-पटक, सरकार की नीति-नीयत पर प्रश्न उठाना राष्ट्रीयता की भावना को उजागर करता है। समय-समय पर बेबाकी से कही गई बात आपकी राष्ट्र-प्रेम की भावना परिलक्षित करता है।

करीब १३ वर्षों से असाध्य बीमारी से जूझते हुए भी आपको निराश हताश नहीं पाया है। जीवन जीने की जिजीविषा, जिन्दगी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण आपकी एक ऐसी निधि है जिसने ही आपके कर्मठ जीवन को लौ प्रदान की है। एक कल्याणकारी, परोपकारी भावना का प्रवाह आपकी अन्तराष्ट्रीय शुक्तिका फाउन्डेशन में दृष्टिगोचर होता है — साहित्य व संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित करती संस्था, सम्पूर्ण कार्यभार जिम्मेदारी के साथ निभाती है।

आपके जीवन के अनुभव — जिसमें देश के प्रतिष्ठित पुरुषों, महापुरुषों से साक्षात्कार होना, विभिन्न घटनाओं का साक्षी होना, निरन्तर ज्ञानवर्धक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं से अवगत होते हुए अपने स्नेह भाजनों को भी दिशा और दशा दिखाते चलना — आपकी स्वकर्मणयता का परिचायक है। आपको कनिष्ठों ने सदैव अभिभावक स्वरुप श्रद्धेय माना, वहीं समवयस्कों के प्रीतिकर रहे हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन, देश के विभिन्न मंचों पर चर्चा-परिचर्चाएँ, काव्य लहरी की गंगा प्रवाहित की है।

दर्जनों पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है व काव्य रचनाओं, लेखों, विचार प्रवाहों को देश विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ससम्मान स्थान मिला है। अनेक संस्थाओं ने आपकी लेखनी को सम्मानित करते हुए स्वयं को गौरवान्वित महसूस किया है।

आपके असाधारण व्यक्तित्व व कृतित्व पर विश्लेषण करने हेतु मेरी अस्थिर प्रज्ञा स्वयं को असक्षम पाती है — यह सिर्फ हृदय के उद्गार हैं। आपकी सतत लेखनी साहित्य को समृद्ध करती रहे, मेरी अनंत शुभकामनाएं।

सविता पोद्दार
सविता पोद्दार
कवयित्री, कहानीकार
उद्घोषिका — आकाशवाणी कोलकाता
अभिमत

आपकी लेखनी से प्राप्त होने वाले आनंद की फुहार गाहे-बगाहे पड़ती ही रहती है। आपने देवभाषा संस्कृत में भी अपनी पहुँच और प्रतिभा से हिन्दी की श्रीवृद्धि में जो योगदान किया है वह सराहनीय है।

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प्रिय सुरेश जी!

आपकी लेखनी से प्राप्त होने वाले आनंद की फुहार गाहे-बगाहे पड़ती ही रहती है। आपने देवभाषा संस्कृत में भी अपनी पहुँच और प्रतिभा से हिन्दी की श्रीवृद्धि में जो योगदान किया है वह सराहनीय है।

आपने कविकुल रवि गुरुदेव रवीन्द्र के ६८ गीतों का छंदबद्ध अनुवाद करके एक पुस्तक रूप में हिन्दी साहित्य की समृद्धि में जो योगदान किया है, वह मेरी भी जानकारी में प्रथम प्रयास है।

इस आशा और आपके प्रति प्रशंसा-भाव सहित — आपका।

राम गोविंद
पटकथा एवं कहानी लेखक — फ़िल्म ‘बागबान’
मुंबई, महाराष्ट्र
व्यक्तित्व

आदरणीय सुरेश जी को पढ़ने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि अगर आप इन्हें खालिस मनोरंजन या टाइमपास के लिए पढ़ रहे हैं, तो फिर इनका लेखन आपके लिए नहीं है। इनका लेखन उन पाठकों के लिए है जो एकरसता से ऊब चुके हैं।

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तीस से ज्यादा पुस्तकों के लेखक सुरेश चौधरी ‘इंदु’ जी के बहुआयामी व्यक्तित्व का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इन्होंने ग्रेजुएशन साइंस स्ट्रीम से किया और फिर चार्टर्ड अकाउंटेंट बन गए। कॉमर्स और साइंस अध्ययन की दो अलग धाराएं हैं — अगर बोलचाल की आम भाषा में कहें तो उत्तर और दक्षिण। इसलिए बहुत कम लोग आपको ऐसे मिलेंगे जो ऐसा कर पाते हैं। बिल्कुल ऐसी ही विविधता इनके लेखन में है।

अब तक ये मूल रूप से अध्यात्म, धर्म और दर्शन पर लिखते रहे हैं, देशाटन पर भी लिखा है, छंदबद्ध कविताएं लिखीं हैं, और अब कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की बांग्ला कविताओं का हिंदी में अनुदित छंद संग्रह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया।

आदरणीय सुरेश जी को पढ़ने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि अगर आप इन्हें खालिस मनोरंजन या टाइमपास के लिए पढ़ रहे हैं, तो फिर इनका लेखन आपके लिए नहीं है। इनका लेखन उन पाठकों के लिए है जो एकरसता से ऊब चुके हैं; साहित्यजगत में कविता के नाम पर जो कुछ उबड़खाबड़ परोसा जा रहा है, उससे अलग कुछ चाहते हैं; जो लोग अपने विचारों में नयापन लाना चाहते हैं, विचारों को मंथन के लिए उकसाना चाहते हैं, अपने शब्द भंडार को समृद्ध करना चाहते हैं और हमारी समृद्ध संस्कृति व भाषा परंपरा से रूबरू होना चाहते हैं।

मेरी हार्दिक बधाई। हार्दिक आभार।

शिखर चंद जैन
प्रख्यात मोटीवेशनल लेखक एवं स्तंभकार
कोलकाता, पश्चिम बंगाल
अभिमत

यहां एक बात और महत्वपूर्ण है, कि आप अहिंदीभाषी राज्य में रहते हुए हिन्दी की पताका फहरा रहे हैं।

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‘साहित्य’ का शाब्दिक अर्थ होता है, जिसमें हित के भावना सन्निहित हो। हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि साहित्य सृजन भी एक साधना एवं सेवा है — जिसका भली-भांति निर्वहन कर रहे हैं आदरणीय सुरेश चौधरी ‘इंदु’ जी।

यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि चौधरी साहब प्रतिदिन लिखते हैं। आप मुख्य रूप से छंदबद्ध धार्मिक रचनाएं लिखते हैं। यहां एक बात और महत्वपूर्ण है, कि आप अहिंदीभाषी राज्य में रहते हुए हिन्दी की पताका फहरा रहे हैं।

आप ना केवल स्वयं, अपितु दूसरे साहित्यकारों को विभिन्न मंचों के माध्यम से हिन्दी सेवा का अवसर प्रदान कर रहे हैं। आप ‘हिन्दी सेवा समूह’ के भी संस्थापक सदस्य हैं। आपको वर्ष 2022 में समूह की ओर से सक्रिय सहभागिता के लिए सम्मानित किया जा चुका है। आप समूह में भी रचनाओं के प्रेषण के साथ-साथ अन्य चर्चाओं में भी सम्मिलित होते हैं।

आपकी साहित्यिक अभिरुचि आपके कार्यक्षेत्र से मेल नहीं खाती है, परन्तु फिर भी आप एक कुशल एवं प्रशिक्षित चित्रकार की तरह साहित्यरूपी चित्रण कर रहे हैं। हम सब आपकी लेखनी को नमन करते हुए, ईश्वर से आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।

डॉ० अशोक गिरि
संस्थापक सचिव — श्रवण सेवा एवं शोध संस्थान (पंजी०)
हरिद्वार, उत्तराखण्ड
पुस्तक समीक्षा

काव्य की अभिव्यक्ति के लिए न ईंट-पत्थर की, न छैनी-हथौड़े की और न रंग-तूलिका की आवश्यकता होती है। सिर्फ़-ओ-सिर्फ़ शब्दों के सहारे ही काव्य गठित होता है।

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काव्यकला की तुलना, मात्र संगीत से ही हो सकती है, क्योंकि ललित कलाओं में ये दोनों ही गतिशील कलाएं हैं। पर इस विचार के इतर एक अन्य विचार, जो संभवतः अधिक प्रौढ़ है, कि कला एक अखंड अभिव्यक्ति है, उसे खंडित करना नामुमकिन है।

रचनाकार अपनी मानसिक अभिव्यक्ति को भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त करता है। यही मानसिक अभिव्यक्ति कला का बाहरी रूप धारण करती है। इस बाहरी रूप को धारण करने के लिए कभी-कभी बाहरी उपकरणों का सहारा लेना पड़ता है। मेरे विचार में रचनाकार जितने कम बाहरी उपकरणों का प्रयोग करेगा, कला उतनी ही श्रेष्ठ होगी। रचना से प्राप्त आनंद जितने समय स्थिर रह सकेगा, वह उतनी ही श्रेष्ठ होगी।

काव्य की अभिव्यक्ति के लिए न ईंट-पत्थर की, न छैनी-हथौड़े की और न रंग-तूलिका की आवश्यकता होती है। सिर्फ़-ओ-सिर्फ़ शब्दों के सहारे ही काव्य गठित होता है। इस सम्बन्ध में शब्द भी बाह्य उपकरण हुए, किन्तु ये न्यूनतम उपयोग है। अपने अंतस में उमड़े भावों का यदि कोई ग्राफ तैयार किया जाये तो किसी न किसी भाषा की आवश्यकता अवश्य ही होगी।

इस सम्बन्ध में श्री सुरेश चौधरी, जिन पर माँ सरस्वती की असीम कृपा है, ने लोक से लोकोत्तर की यात्रा का अनुभव अपनी इस पुस्तक में प्रार्थनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है और न्यूनतम उपकरण का उपयोग सम्यक तरीके से किया है। जब श्री चौधरी कुछ रचते हैं तो शब्द, उनके मनोभावों का आकार स्वयं ग्रहण करते हैं।

प्रत्येक मनुष्य काव्य का रचनाकार नहीं हो सकता, इसलिए वो अपने मनोभावों के निकटतम भावों की रचना से अभिभूत होता है और समझता है कि ये रचना उसने स्वयं रची है। सनातन धर्म में जड़ता कभी नहीं रही और इस जगत से उस जगत की यात्रा के अनुभव और उस यात्रा में काम आने वाले सभी उपकरणों को शेयर किये जाने की परम्परा भी रही है। अतः इस सम्बन्ध में, श्री चौधरी की भावों में डूबकर, उन्हें अनुभूत कर रची ‘प्रांजलि’ की प्रार्थनाएं सभी जनों की आध्यात्मिक यात्रा में सहायक सिद्ध होंगी।

वीरेन्द्र गोस्वामी
प्रसिद्ध समीक्षक
जयपुर, राजस्थान
शब्द-चित्र

सुरेश जी स्वस्थ रहें या अस्वस्थ रहें, चिंतन के सागर में डूब कर साहित्य को अमूल्य मोती प्रदान कर रहे हैं।

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हमारे आज के साहित्य नभ में अनेक सितारे अपनी लेखनी का प्रकाश बिखेरकर दीप्तिमान हो रहे हैं और धरती को रोशन कर रहे हैं। इन सितारों में एक ‘इंदु’ — सुरेश चौधरी जी हैं, जो गद्य और पद्य की हर विधा में अपनी चमकदार, धारदार लेखनी से ३० से अधिक पुस्तक लिख चुके हैं। पेशे से कभी चार्टर्ड एकाउंटेंट रहे और पीएचडी से भी सुशोभित रहे, और फिर निजी इस्पात के 18 कारखाने लगाये और इस क्षेत्र में सरकार से सम्मान भी प्राप्त किया।

परंतु सुरेश जी को तो कहीं और ही नाम कमाना था। माँ सरस्वती पुकार रहीं थी और माँ शारदे की पुकार पर लेखनी उठाई और बन गये कलम के सिपाही — धारदार, चमकदार लेखनी की कलम की तलवार लेकर। सुरेश जी की अद्भुत कलम कभी तीखी होकर सत्य उजागर करती, तो कभी भक्ति में डूबी वेद उपनिषद पुराणों का ज्ञान देती कलम; कभी इतिहास के घोड़ों पर सवार हमारे देश के वीरों की गाथा याद कराती कलम; कभी जो गलतियाँ पूर्वजों से हुई थीं उनको न दोहराने की कसम खिलाती कलम; कभी पर्यटन कराती, कभी हृदय में प्रेम के कमल खिलाती कलम।

सुरेश जी हिंदी के शब्द जो अभी लुप्त होते जा रहे हैं, उनका बहुत ही सुंदर तरीके से प्रयोग करके वापस उनकी खूबसूरती समझाते हैं। अलंकारों का अद्भुत प्रयोग करना सुरेश जी का विशेष गुण है।

सुरेश जी साहित्य जगत के इंदु, जो चंद्रमा की तरह रातो में जगते हैं, हर प्रातः प्रभु को एक स्वरचित भजन अर्पित करते हैं। स्वस्थ रहे या अस्वस्थ रहें — चिंतन के सागर में डूब कर साहित्य को अमूल्य मोती प्रदान कर रहे हैं।

सुरेश सर की प्रकाशित कुछ पुस्तकों के नाम पर मेरी कविता —

कुछ माणिक कुछ मोती लाये, / प्रांजली और स्वरांजली देकर, / वैदिक सनातन धर्म समझाये। / वेद सूक्तों के काव्य बनाकर, / वेद वेदांत उपनिषद पढाये। / ऋचाओं से पावन माँ बतलाकर, / दुर्गाविनाशिनी को प्रसन्न कराये।

आदिशंकर रस माधुरी, / हरहर महादेव को दी भावांजली। / चमत्कृत भाषा है संस्कृत, / सबको सुभाषितम सिखलाये। / भारतीय दर्शन सबको दिखाया, / अन्य दर्शन भी समझाये। / मनुस्मृति की कर समीक्षा, / सुर तरंगिनी के सुर गाये।

बुलबुले सी है ये जिंदगी, / क्यु तो इसमें मोह लगाये। / तिमिर ढलेगा भ्रम भ्रांति घटेगी, / मूल्यांकन जब स्वयं का पाये। / हे गोविंद हे गोपाल पुकारा, / श्रीमद भागवत महापुराण समझाये। / सुरेश सर की अनुपम पुस्तके, / जो पढे ज्ञानवृद्धि वो पाये।

शालिनी गर्ग
शालिनी गर्ग
प्रवासी कवयित्री
दोहा, क़तर
चिंतन

आपका भावपक्ष अनुभूतियों और अनुभव के एक विस्तृत आकाश को स्वयं में समेटे हुए है। आपकी कलम अभी ऊर्जित है और विश्वास है कि आगे भी रहेगी।

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बात 2021 की है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी आदरणीय सुरेश चौधरी सर से पहली बार फोन पर बात हुई। उन दिनों ही उन्होंने फेसबुक पर ‘रचनाकार’ नामक एक साहित्यिक ग्रुप बनाया था; उन्होंने मुझसे भी इस ग्रुप से जुड़ने का आग्रह किया। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। कालांतर में उन्होंने मुझे उत्तर भारत इकाई के प्रबंधन का दायित्व भी सौंपा।

समूह की गतिविधियों के दौरान मैंने जाना कि वे साहित्य के प्रति कितने समर्पित हैं। वे तकरीबन रोज ही ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन करते। वे खराब स्वास्थ्य के बावजूद स्वयं पूरे समय कार्यक्रम में उपस्थित रहते, और ऐन वक्त भी कोई कार्यक्रम में जुड़ना चाहता तो कभी मना नहीं करते। कार्यक्रम समय सीमा से पार चले जाने पर भी वे सभी को अवसर देते। नवोदितों के प्रति उनकी सदाशयता अनुकरणीय है।

साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि उनकी नित्य दैनिक रचनाओं के माध्यम से देखने को मिली। वे बगैर नागा रोज अन्यान्य विधाओं में कविता लिखना सर की विशेषता है। 2023 में रचनाकार के द्वितीय वार्षिक उत्सव में कोलकाता में पहली बार सर से मुलाकात हुई! मिलनसार सरल स्वभाव के आदरणीय सुरेश सर अद्भुत प्रतिभा के धनी होने के बावजूद जमीन से जुड़े हुए हैं। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों में उनका यह रूप दिखाई देता है।

मूलतः व्यवसायी होने के उपरांत किसी का साहित्य के प्रति इतना लगाव और जूनून दुर्लभ है। उनकी साहित्यिक यात्रा की बात करें तो वह हमें चौंका सकती है। कोई व्यक्ति इतने कम समय मे इतनी पुस्तकें कैसे रच सकता है, यह तथ्य उनके सतत प्रयासों को रेखांकित करता है।

अब तक उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, कुछ अप्रकाशित भी हैं। उन्होंने कई पुस्तकों का अनुवाद कार्य भी किया है — तिमिर ढलेगा (कविता संग्रह), बुलबुले सी जिन्दगी (छन्द मुक्त कविता संग्रह), कुछ माणिक कुछ मोती (प्रांजल हिन्दी में रचित छन्द बद्ध कविताएं), प्रांजलि (जीवन दर्शन पर आधारित 101 प्रार्थनाएँ), आसमान को छू लें (बाल गीत), है माँ (20 गीत छन्द बद्ध एवं छन्द मुक्त), भारतीय दर्शन, भारत के अन्य दर्शन, वेदान्त, श्रीमदभागवत महापुराण-परिचय एवं समीक्षा, वेदों का परिचय एवं समीक्षा, मनुस्मृति-परिचय एवं समीक्षा।

आप देख सकते हैं कि इन पुस्तकों में न केवल कविता है — जीवन दर्शन, आध्यात्म और अन्य विषयों पर भी आपकी लेखनी ने कमाल किया है। आपके भजन भी बहुत संख्या में हैं और निराले हैं। आपके शब्द भंडार पर बड़े से बड़े शब्दकारों को ईर्ष्या हो सकती है।

आपका भावपक्ष अनुभूतियों और अनुभव के एक विस्तृत आकाश को स्वयं में समेटे हुए है। आपकी कलम अभी ऊर्जित है और विश्वास है कि आगे भी रहेगी। आपके साहित्यिक योगदान के मूल्यांकन का समय आ गया है। यहाँ जो दुर्लभ निधियां हैं उन्हें साहित्य प्रेमियों के समक्ष आना ही चाहिए। आपके द्वारा साहित्य में गहन काम किया गया है और अभी भी अनवरत यह सिलसिला चल रहा है। ईश्वर से प्रार्थना है आपको स्वस्थ रखें और आप देश व समाज के लिए और भी खूब लिखें।

माधुरी स्वर्णकार
माधुरी स्वर्णकार
प्रतिष्ठित कवयित्री
नई दिल्ली, भारत
पुस्तक समीक्षा

आत्माविहीन शरीर का कोई अर्थ नहीं होता, इसलिए इस संकलन के पाठक को विविध रंगों में अपनी ही जिंदगी की यात्रा दृष्टिगोचर होती है।

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कविता एक नदी है, जो भावों की धरा पर अथकित अनवरत बहती रहती है, जिसके किनारे पर बैठ कर कवि चिंतन करता है, और नूतन दर्शन के मोती चुन लेता है।

सुरेश चौधरी ‘इंदु’ के संकलन ‘बुलबुले सी जिंदगी’ को मैंने आद्योपांत पढ़ा है, तीन बार पढ़ा है। हर बार यही सोचा है कि छंद से इतर भी इन कविताओं में लय विद्यमान है, जो काव्य की आत्मा है। आत्माविहीन शरीर का कोई अर्थ नहीं होता, इसलिए इस संकलन के पाठक को विविध रंगों में अपनी ही जिंदगी की यात्रा दृष्टिगोचर होती है।

परिवार के शाश्वत संबंधों के अनुराग से आरम्भ करते हुए ‘चौधरी’ गीता के दर्शन को भी आत्मसात करते हैं, और मानव जीवन की क्षण भंगुरता का बोध कराते हैं। मुझे आनंद की अनुभूति का वह क्षण भी मिला जहाँ स्वयं की समाधि लग जाया करती है। यही कविता की श्रेष्ठता का प्रमाण है।

कविता के कैनवास के विस्तार का अनुमान नहीं लगता है कि कहाँ कवि गया है। परन्तु वह जहाँ जहाँ गया है वहाँ जीवन है, जागृति है, स्तुति है, प्रगति है, प्रभाव है। मैं संकलन के यशस्वी होने का आशीष देता हूँ। — हरतालिका २४-०८-२०१७

रामेन्द्र मोहन त्रिपाठी
लोकप्रिय गीतकार
आगरा, उत्तर प्रदेश

स्रोत — “प्रज्ञान विश्वम्”, रचनाकार भारत फाउंडेशन, कोलकाता।