अनंत चतुर्दशी : अनंत स्वरूप की आराधना का पर्व
अनंत चतुर्दशी अर्थात भगवान विष्णु के अनंत रूप की आराधना का दिन है। हिंदू धर्म ग्रंथों में इसका विशेष महत्व है। यह दिन भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा के लिए समर्पित है। पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में इसका वर्णन विस्तार से मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा की जाती है, और अनंत सूत्र — एक विशेष प्रकार का धागा — को धारण करने का महत्व होता है। ऐसा माना जाता है कि इस धागे को धारण करने से व्यक्ति के जीवन से सभी समस्याएं समाप्त होती हैं और सुख-समृद्धि आती है।
आज ही के दिन कहते हैं गणेश जी ने महाभारत का लेखन पूर्ण कर अपने ऊपर दस दिनों के अथक परिश्रम के चलते स्वेद कण, धूल कण से निवृत्ति लेने हेतु जल में स्नान कर उन्हें विसर्जित किया था, अत: गणेश विसर्जन मनाया जाता है, जबकि यह विसर्जन उनके मैल का है। एक दृष्टि से यह सृजन और विसर्जन — दोनों का संगम है।
पौराणिक आधार
महाभारत के अनुसार, पांडवों के वनवास के समय भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को अनंत चतुर्दशी का व्रत करने का उपदेश दिया था। उन्होंने बताया कि इस व्रत को करने से सभी कष्टों का नाश होता है और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भविष्य पुराण में कौण्डिन्य ऋषि और उनकी पत्नी शीला की कथा आती है। शीला ने 14 गांठों वाला अनंत सूत्र धारण कर व्रत किया, जिससे उनके घर में समृद्धि आई। कौण्डिन्य ने अज्ञानवश उस सूत्र को तोड़कर अग्नि में डाल दिया, जिसके बाद उनका वैभव नष्ट हो गया। पश्चाताप स्वरूप उन्होंने वन-वन में अनंत को खोजा और अंत में भगवान विष्णु के दर्शन पाकर क्षमा प्राप्त की। तभी से यह व्रत दांपत्य की अखंडता और क्षमा भाव का प्रतीक भी माना जाता है।
वेदों में अनंत का स्वरूप
“अनंत” शब्द वेदों में भगवान के अनंत और असीमित स्वरूप का प्रतीक है। भगवान विष्णु को उनके अनंत रूप में आदिकाल से माना गया है। वेदों में भगवान को निराकार, अनादि, और अनंत कहा गया है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि ईश्वर का स्वरूप सीमाओं से परे है। ऋग्वेद और यजुर्वेद जैसे ग्रंथों में भगवान के अनंत स्वरूप की महिमा गाई गई है।
मान्यता है कि अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु ने 14 लोकों की रचना के बाद इसके संरक्षण और पालन के लिए चौदह रूपों में प्रकट हुए थे। इसलिए अनंत चतुर्दशी को 14 लोकों और भगवान विष्णु के 14 रूपों का प्रतीक माना गया है।
ज्योतिष के अनुसार अनंत सूत्र की चौदह गांठें — भूलोक, भुवलोक, स्वलोक, महलोक, जनलोक, तपोलोक, ब्रह्मलोक, अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल लोक का प्रतीक हैं।
पूजा विधि
इस दिन प्रात: स्नान कर कुश के बने अनंत की स्थापना की जाती है। अनंत सूत्र को कुमकुम, केसर और हल्दी में रंगा जाता है। पुरुष दाहिने हाथ में और स्त्री बाएं हाथ में इसे धारण करती हैं। 14 वर्ष तक लगातार व्रत करने का संकल्प श्रेष्ठ माना जाता है।
पूजा मंत्र है
जैन धर्म में अनंत चौदस
जैन कैलेंडर के उत्सवों में यह एक महत्वपूर्ण दिन है। जैन भादो महीने के आखिरी 10 दिनों में पर्युषण पर्व मनाते हैं। दिगंबर जैन दस दिन तक दसलक्षण पर्व मनाते हैं और चतुर्दशी — जिसे अनंत चौदस भी कहते हैं — दसलक्षण पर्व का आखिरी दिन होता है। यह वह दिन है जब वर्तमान ब्रह्मांडीय चक्र के 12वें तीर्थंकर वासुपूज्य ने निर्वाण प्राप्त किया था। क्षमावाणी, वह दिन जब जैन जानबूझकर या अनजाने में की गई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं, अनंत चतुर्दशी के एक दिन बाद मनाई जाती है।
परम ईश की वंदना
आइये परम ईश की आराधना में यह वंदना पढ़ें —
अनंत का अर्थ ही है जिसका न अंत हो, न आदि। इसलिए यह व्रत केवल किसी इच्छा के लिए नहीं, बल्कि यह स्मरण कराने के लिए है कि जीवन की समस्याएं अंत वाली हैं, पर ईश्वर का अनुग्रह अनंत है।